साइकिल की पहली सवारी
साइकिल की पहली सवारी
बचपन बोला—"चल, उड़ते हैं!", मन ने भी हुंकार भरी,
दो पहियों पर सपने बैठे, किस्मत ने किलकारी भरी।
नई-नवेली साइकिल आई, जैसे आई हो बरसात,
घंटी बोली—"ट्रिंग-ट्रिंग-ट्रिंग!", मन बोला—"अब मेरी बात!"
पापा बोले—"धीरे चलना, जल्दी मत तू वीर बने",
मैं बोला—"अब देखिए पापा, कैसे सारे तीर छने!"
पहला पैडल... पहला झटका... पहला ही इतिहास हुआ,
साइकिल ऊपर, मैं नीचे था... धरती से परिचय ख़ास हुआ।
घुटने छिलकर लाल हुए तो, आँखों ने भी शोर मचाया,
माँ ने फूँक मारी, माथा चूमा, दर्द ने झट बस्ता उठाया।
मित्र खड़े थे ठहाके लेकर—"वाह! क्या चालक निकला है!"
मैंने हँसकर धूल झाड़ी—"अभी तो खेल शुरू हुआ है!"
रोज़ गिरा, फिर रोज़ उठा मैं, हार कभी स्वीकार न की,
ठोकर को शिक्षक मान लिया, हिम्मत से तकरार न की।
एक दिवस जब पापा ने चुपके, पीछे से वह हाथ हटाया,
मैंने समझा साथ खड़े हैं... मुड़कर देखा... कोई न पाया!
डर भी भागा, मन भी जागा, विश्वासों ने ली अंगड़ाई,
उस दिन मुझको समझ में आई, अपनी ही असली तरुणाई।
फिर तो ऐसी रफ़्तार पकड़ी, हवा भी पीछे छूट गई,
गली-गली मेरी घंटी सुनकर, नींद सभी की टूट गई।
कुत्ता भागा, बिल्ली उछली, बकरी बोली—"रास्ता दो!",
मैंने ब्रेक लगाया ऐसा... खुद ही बोला—"हे राम! बचो!"
नाली, गड्ढे, मोड़, ठिकाने, सबके अपने किस्से थे,
हर गिरने के बाद उठे जो, वही तो सच्चे हिस्से थे।
अब तो जीवन कारों वाला, भागमभाग का मेला है,
पर बचपन की साइकिल वाला, सुख सबसे अलबेला है।
वह दो पहिए सिर्फ़ नहीं थे, साहस की पहचान बने,
गिरकर फिर से उठ जाने के, जीवन के वरदान बने।
आज भी जब यादें आतीं, मन बचपन बन जाता है,
एक पुरानी ट्रिंग-ट्रिंग सुनते ही, दिल मुस्काता, गाता है।
साइकिल ने बस एक सबक़, जीवन भर दोहराया है—
जो गिरकर भी फिर उठ जाए, उसने ही जग जीता है।
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