वर्ष नव,हर्ष नव
वर्ष नव , हर्ष नव नए वर्ष की प्रातः सबसे अनूठी है। हो भी क्यों नहीं , आज ही तो सुबह की सबसे पहली किरण के साथ नया वर्ष हमारे घर-आंगन में , हमारे जीवन में आया है। समूची सृष्टि में विधान बनकर वही चहुं ओर छाया है। नव वर्ष के आगमन की खुशी में प्राची में उषा ने अपना प्राचीन आंचल उतार फेंका है। इसका मुख दिव्य रक्तकमल की भांति उद्भासित है और हर क्षण स्वर्ण की कांति का दसों दिशाओं में विकिरण कर रहा है। वसुंधरा के आंगन में नए सूरज का उदय हुआ है। नए सूरज की हर किरण में नई संभावनाओं की झिलमिल है , जागृत आत्माओं की अंतर्चेतना में एक एहसास , एक अनुभूति है कि जगत और जीवन में इस नए वर्ष में बहुत कुछ नया प्रस्तुत होगा। भौतिक पदार्थ एवं परिस्थितियों की अप्रत्याशित उलट-पुलट के बीच कुछ नया दिखेगा , वह आध्यात्मिक अंतर्चेतना में एक नए आलोक का अवतरण करेगा। समूची सृष्टि को अपनी स्वर्णिम किरणों से ज्योतिर्मय कर रहे आज के सूर्य का यही संदेश है। यह सूर्य दिव्य चेतना से चेतन है। इसके प्रकाश में परिस्थितियों के भविष्य स्वरूप की आध्यात्मिक अंतर्संभावनाओं की अनेक झांकियां झलक रही हैं। सर्वज्ञ चेतना मे...