ऐ उम्र..!

 

ऐ उम्र..!

खतरे के निशान से

ऊपर बह रहा है

तेरा पानी।

कुछ कहा मैंने,

पर शायद तूने सुना नहीं..

तू छीन सकती है बचपन मेरा,

पर बचपना नहीं..!!

वक़्त की बरसात है कि

थमने का नाम

नहीं ले रही।

घर चाहे कैसा भी हो

उसके एक कोने में

खुलकर हंसने की जगह रखी है मैंने

सूरज चाहे आसमान में हो

उसको घर बुलाने का रास्ता रखा है मैंने

कभी कभी छत पर चढ़कर

तारे गिन आती हूं

हाथ बढ़ा कर

चाँद को छूने की कोशिश कर आती हूं

भीगकर बारिश में

एक काग़ज़ की किश्ती चला आती हूं

कभी हो फुरसत मिली

तो कागज़ की एक पतंग उड़ा आती हूं

घर के सामने जो पेड़ है

उस पर बैठे पक्षियों की बातें सुन आती हूं

घर चाहे कैसा भी हो

घर के एक कोने में

खुलकर हँसने की जगह रखी है मैंने

जिधर से गुज़र गई

मीठी सी हलचल मचा दी है मैंने

खतरे के निशान से

ऊपर बह रहा है

तेरा पानी।

कुछ कहा मैंने,

पर शायद तूने सुना नहीं..

तू छीन सकती है बचपन मेरा,

पर बचपना नहीं..!!

-मीता गुप्ता

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