ख़ुशियाँ भी कहाँ कम हैं

 

ख़ुशियाँ भी कहाँ कम हैं

खुशियां बांटने से बढ़ती हैं और दुख बांटने से घटता है। यही वह दर्शन है जो हमें स्व से पर-कल्याण यानी परोपकारी बनने की ओर अग्रसर करता है। जीवन के चौराहे पर खड़े होकर यह सोचने को विवश करता है कि सबके लिए जीने का क्या सुख है? मनुष्य के समाज के प्रति उसके कुछ कर्तव्य भी होते हैं। सबसे बड़ा कर्तव्य है एक-दूसरे के सुख-दुख में शामिल होना और यथाशक्ति सहायता करना।
आज की बात.... 26.05.2021,आज



उसने कहा- बेवजह ही ख़ुश क्यों हो ?

मैंने कहा- हर वक्त दुखी भी क्यों रहूँ  ??

उसने कहा- जीवन में

बहुत ग़म है....

मैंने कहा -गौर से देख,

ख़ुशियाँ भी कहाँ कम हैं..


उसने तंज़ किया -

ज़्यादा हँस मत,

नज़र लग  जाएगी!!

मेरा ठहाका बोला-

हंसमुख हूँ, 

नज़र भी

फिसल जाएगी...

उसने कहा- नहीं होता

क्या तनाव कभी??

मैंने जवाब दिया- ऐसा

 तो कहा नहीं!


उसकी हैरानी बोली-

फिर भी यह हँसी !!

मैंने कहा-डाल ली आदत हर घड़ी मुसकराने की..


उसने फिर तंज़ किया- 

अच्छा!

बनावटी हँसी..

इसीलिए

परेशानी दिखती नहीं...


मैंने कहा- अटूट विश्वास!

मालिक हैं मेरे साथ!!

फिर चिंता-परेशानी का क्यों लें साथ!

वह मुझसे "मैं दुखी हूँ" सुनने को थी बेताब!

इसलिए प्रश्नों का

सिलसिला भी था 

बेहिसाब ....

उसने पूछा - कभी तो

छलकते होंगे आँसू?


मैंने कहा-अपनी मुस्कानों से बाँध बनाया  है.....

अपनी हँसी कम पड़े तो कुछ और लोगों को

हँसा देती हूँ...


कुछ बिखरी ज़िंदगियों में,

उम्मीदें जगा.... देती हूँ...

यह मेरी मुस्कान

दुआएं हैं, 

उन सबकी..

जिन्हें मैंने तब बाँटा,

जब मेरे पास भी कमी थी...



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