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Showing posts from June, 2021

‘वंदे मातरम्’

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    ‘ राष्ट्रगीत ‘ वंदे मातरम् ’ बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय के जन्मदिवस पर विशेष ’ बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय ( 27 जून 1838 - 8 अप्रैल 1894) बंगाली के प्रख्यात उपन्यासकार , कवि , गद्यकार और पत्रकार थे। भारत का राष्ट्रीय गीत ‘ वंदे मातरम् ’ उनकी ही रचना है , जो भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के काल में क्रांतिकारियों का प्रेरणास्रोत बन गई थी । ‘ वंदे मातरम् ’ मात्र दो शब्द   ही नहीं थे , ये आह्वान थे उन सभी भारतीयों के लिए , जो अपनी मातृभूमि को दासता की बेड़ियों से मुक्त करने के लिए कृतसंकल्प थे । ‘ वंदे मातरम् ’   गीत उनके ‘ आनंद मठ ’ नामक बांग्ला उपन्यास में संकलित है , जिसकी रचना बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने 1882 में की थी। इस कृति का कथानक इतना सशक्त है कि प्रकाशित होते ही यह पहले बंगाल और कालांतर में समूचे भारतीय साहित्य व समाज पर छा गया। आनंदमठ राजनीतिक उपन्यास है। इस उपन्यास में उत्तर बंगाल में 1773 के संन्यासी विद्रोह का वर्णन किया गया है। इस उपन्यास में यह गीत भवानंद नाम के संन्यासी द्वारा गाया गया है। बंकिम ने अप्रशिक्षित , किंतु अनुशासित संन्यासी सैनिको...

7वें अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस 21 जून 2021 हेतु विशेष-

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  7वें अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस 21 जून 2021 हेतु विशेष- ध्यान तथा स्वास्थ्य के द्वारा जीवन कौशलों का विकास   चित्त को एकाग्र करके किसी ओर लगाने की क्रिया को ध्यान कहते हैं। यह योग के आठ अंगों-यम ,  नियम ,  आसन ,  प्राणायाम ,  प्रत्याहार ,  धारणा ,  ध्यान ,  और समाधि ,  में से सातवां अंग है , जो समाधि से पूर्व की अवस्था है। मन को लगाते हुए मन को ध्येय के विषय पर स्थिर कर लेता है तो उसे ध्यान कहते हैं। ध्यान से आत्म साक्षात्कार होता है। ध्यान को मुक्ति का द्वार कहा जाता है। ध्यान एक ऐसी प्रक्रिया है ,  जिसकी आवश्यकता हमें लौकिक जीवन में भी है और अलौकिक जीवन में भी इसका उपयोग किया जाता है। ध्यान को सभी दर्शनों ,  धर्मों व संप्रदायों में श्रेष्ठ माना गया है। अनेक महापुरुषों ने ध्यान के ही माध्यम से अनेक महान कार्य संपन्न किए। जैसे- स्वामी विवेकानंद एवं भगवान बुद्ध आदि। ध्यान शब्द की व्युत्पत्ति ‘ ध्यैयित्तायाम् ’ धातु से हुई है। इसका तात्पर्य है चिंतन करना। यहाँ ध्यान का अर्थ चित्त को एकाग्र करना उसे एक लक्ष्य पर स्थिर क...

कृतज्ञता

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  कृतज्ञता जिस जिससे पथ पर स्नेह मिला उस उस राही को धन्यवाद। जब-जब कविवर शिवमंगल सिंह ‘ सुमन ’ की ये पंक्तियां पढ़ती हूं , तो सोचने लगती हूं कि उन्होंने जाने-अनजाने हर राही को धन्यवाद क्यों दिया होगा ? गंभीरता से सोचने पर पाती हूं कि कृतज्ञता ही तो मनुष्य जीवन की सर्वोत्कृष्ट विशेषता है। यह प्रकृति ईश्वर की देन है।ईश्वर ने हमें बनाया , यह श्वास दी , तो सर्वप्रथम हम उस ईश्वर के प्रति कृतज्ञ हैं | यदि जीवन में हम अपने प्रति किसी भी रूप में की गई सहायता के प्रति कृतज्ञता प्रकट करते हैं , तो हमारा यह जीवन कर्तव्य है।ईश्वर के बाद हमें अपने माता-पिता के प्रति भी कृतज्ञ होना चाहिए , जिनकी कृपा से हमें यह जीवन मिला है | हमें अपने गुरुओं के प्रति भी कृतज्ञ होना चाहिए , जिनकी कृपा से हमने जीवन जीना सिखा। इसी तरह हमें अपने जीवन के भागीदार प्रत्येक व्यक्ति के प्रति कृतज्ञ होना चाहिए। कृतज्ञता इस दुनिया का सबसे महान गुण है। कृतज्ञता हमें यह एहसास दिलाती है कि अपने जीवन में प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में किसी न किसी के द्वारा जो सहायता की गई है , हम अगर बदले में उसको कुछ ना दे...

हवा

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  15.06.2021 ग्लोबल विंड डे (15.06.2021) के अवसर पर एक रचना हवा को समर्पित हवा... चल पड़ी है वो हवा , बिना पंखों के उड़ती , पेड़ों की शाखों पर झूलती , तितलियों संग खेलती , घासों के लबों को चूमती , मदहोश सी , मदमस्त सी , अल्हड़ सी , आगे बढ़ी , बढ़ती गई , वो बदमाश सी , वो शैतान सी , नटखट सी ….. ।   ऐसे ही इक खुमार में , न जाने किस करार में , छू लिया उसने तभी , पानी के तन को प्यार में , सिहरन हुई , लहरन हुई , दिखने लगी , मुस्कान जब उठने लगी , इस पार से , उस पार तक , उठने लगी , ऐसी लहर , इन हिल्लोरों के संग , हवा भी , संग संग चल पड़ी , पर फिर थम गई , चंचल हवा मदहोश सी , मदमस्त सी , अल्हड़ सी , जब पानी ने पुकारा , पीछे मुड़ी , आकर खड़ी , पास उसके हो गई , चंचल हवा शीतल हुई , कुछ नम हुई , फिर थम गई , जब नम हुई , हवा और पानी , नानी की कहानी , पहली बार हुए , एकाकार हुए , मदहोश सी , मदमस्त सी , अल्हड़ सी , न आगे बढ़ी , न बढ़ती गई , रुक-रुक गई , थम-थम गई … ॥