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Showing posts from February, 2022

बहुभाषी शिक्षा के लिए प्रौद्योगिकी का उपयोग करना: चुनौतियाँ और अवसर

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  भाषा की बात बहुभाषी शिक्षा के लिए प्रौद्योगिकी का उपयोग करना: चुनौतियाँ और अवसर जैसे चींटियाँ लौटती हैं बिलों में कठफोड़वा लौटता है काठ के पास वायुयान लौटते हैं एक के बाद एक लाल आसमान में डैने पसारे हुए हवाई-अड्डे की ओर ओ मेरी भाषा मैं लौटता हूँ तुम में जब चुप रहते-रहते अकड़ जाती है मेरी जीभ दुखने लगती है मेरी आत्मा | भाषा मनुष्य की दृष्टि का विस्तार करने और उनके संकायों को व्यापक बनाने और लोगों को सामाजिक अनुबंधों के मूल्य को समझने में सबसे शक्तिशाली उपकरण है। भाषा लोगों को उनके प्राकृतिक , सामाजिक , आर्थिक और सांस्कृतिक मतभेदों के बावजूद करीब आने के लिए प्रेरित करती है। विभिन्न समाजों की अलग-अलग भाषाएँ होती हैं , लेकिन भाषा की शक्ति सार्वभौमिक होती है। इसी को ध्यान में रखते हुए 1999 में यूनेस्को के आम सम्मेलन द्वारा 21 फरवरी को अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस के रूप में घोषित करने की घोषणा के बाद , वर्ष 2000 से अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस को विश्व स्तर पर मनाया जा रहा है। बांग्लादेश द्वारा ' भाषा शहीदों ' के सम्मान में पहल की गई थी , जिन्होंने 1952 में अपन...

अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस पर विशेष.....

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  अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस पर विशेष..... निज भाषा उन्नति अहै , सब उन्नति को मूल। बिन निज भाषा-ज्ञान के , मिटत न हिय को सूल।। विविध कला शिक्षा अमित , ज्ञान अनेक प्रकार। सब देसन से लै करहू , भाषा माहि प्रचार।।    अर्थात निज यानी अपनी भाषा से ही उन्नति संभव है , क्योंकि यही सारी उन्नतियों का मूलाधार है। मातृभाषा के ज्ञान के बिना हृदय की पीड़ा का निवारण संभव नहीं है। जन्म से हम जिस भाषा का प्रयोग करते हैं , वही हमारी मातृभाषा है। सभी संस्कार एवं व्यवहार इसी के द्वारा हम पाते हैं । इसी भाषा से हम अपनी संस्कति के साथ जुड़कर उसकी धरोहर को आगे बढ़ाते हैं। भारत वर्ष में हर प्रांत की अलग संस्कृति है , एक अलग पहचान है। उनका अपना एक विशिष्ट भोजन , संगीत , पहनावा , भाषा और लोकगीत हैं। इस विशिष्टता को बनाये रखना , इसे प्रोत्साहित करना अति आवश्यक है। मातृभाषा हमें राष्ट्रीयता से जोड़ती है और देश प्रेम की भावना उत्प्रेरित भी करती है। मातृभाषा ही किसी भी व्यक्ति के शब्द और संप्रेषण कौशल की उद्गम होती है। एक कुशल संप्रेषक अपनी मातृभाषा के प्रति उतना ही संवेदनशील होगा जितना...

परिवर्तन ही एकमात्र स्थिर है

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  परिवर्तन ही एकमात्र स्थिर है प्रसिद्ध दार्शनिक अरस्तू ने कहा है- ‘ परिवर्तन प्रकृति का नियम है , हम प्रकृति के इस नियम को जब भी मानने से इनकार करने लगते हैं , तब हम दुखी होते हैं , अवसाद से घिर जाते हैं । जीवन में परिवर्तन होते रहते हैं। यह प्रकृति का नियम है। ‘ जीवन में परिवर्तन ही एकमात्र स्थिर है। परिवर्तन में कभी कोई परिवर्तन नहीं होता। परिवर्तन स्थिर रहता है , अर्थात् परिवर्तन का चरित्र स्थिर है , वह कभी परिवर्तित नहीं होता। प्रकृति में पल-पल परिवर्तन होते रहते हैं। मानव की ज़िंदगी और ऋतुएं निर ंत र परिवर्तित होती रहती हैं। ज़माने में परिवर्तन होता रहता है। कुछ भी स्थिर नहीं है , परंतु वह क्रिया जिसे स्थिर का नाम दिया गया है , वह स्थिर क्रिया है परिवर्तन। जब से मानव-इतिहास शुरू हुआ है , तभी से परिवर्तन होता रहा है , परिवर्तन की प्रक्रिया निरंतर हो रही है। समाज ने तरक्की की है , शिक्षा ने तरक्की की है , चिकित्सा जगत ने तरक्की की है , विज्ञान ने तरक्की की है। यह संसार खुद परिवर्तित होता रहता है , परंतु जीवन में परिवर्तन ही एकमात्र स्थिर है। परिवर्तन संसार का नियम ...