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Showing posts from March, 2022

सहानुभूति या समानुभूति-क्या अंतर है इनमें?

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  सहानुभूति या समानुभूति-क्या अंतर है इनमें ?     सहानुभूति में हम दूसरे के दुख को पहचानकर उसे दूर करने के बारे में सोचते हैं , लेकिन खुद दुखी नहीं होते। इसमें दया करने से अपनी श्रेष्ठता का अहंकार पनपता है। समानुभूति यानी दूसरा जैसा महसूस कर रहा है , वैसा महूसस करना। इसमें संवेदना का व्यवहार नहीं , व्यवहार में संवेदना झलकती है। दोनों में संवेदना की गहराई का फर्क है। अतिशय व्यक्तिवादिता से पीड़ित जिस हिंसक समाज में हम आज जी रहे हैं , वह आक्रामक स्पर्धा को बढ़ावा देकर व्यक्ति को व्यक्ति के खिलाफ़ टकराव की स्थिति में खड़ा कर देता है। आज हम ऐसे संवेदनहीन समूह में बदलते जा रहे हैं , जहां हर ‘दूसरा’ हमारा प्रतिद्वंद्वी है , उसका सुख-दुःख हमें नहीं व्यापता। मानवीय संबंधों में बिखराव के पीछे तो यह है ही , राष्ट्रों के बीच टकराव के पीछे भी कुछ हद तक यह ज़िम्मेदार है। समानुभूति का मतलब है -‘ दूसरा जैसा महसूस कर रहा है , वैसा ही महसूस करना’। इसके लिए स्वयं को दूसरे के स्थान पर रखकर सोचना होता है। सहानुभूति में हम दूसरे के दुख को पहचानकर उसकी मदद करने की सोचते हैं। हमार...

सागर और मैं

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  सागर और मैं विश्व महासागर दिवस (8 जून) के अवसर पर विशेष.... सागर और मैं रेतीले तट पर खड़ी    हुई  , मैं हतप्रभ सम्‍मुख देखती रही । है दृष्‍टि जहाँ तक जाती , दिखता नीली लहरों का राज वहाँ। उस पार उमड़ती लहरों का आलिंगन करता नभ झुक झुक कर। रवि बना साक्षी देख रहा करता किरणों को न्‍योछावर। सागर की गहराई कितनी , कितने मोती ,  माणिक ,  जलचर कितनी लहरें बनती ,  मिटतीं , तीर से टकरा-टकरा कर।   लहरों की गोदी में खेले , नौकाएँ मछुआरों की। आती-जाती लहरें तट का पद प्रक्षालन करती जातीं। सिंधु लहरें क्‍यूँ विकल हैं ? सिंधु लहरें , क्या खोज में अपने किनारों की ?   नीली नीली , वेग़वती , लहरें उठतीं गिरतीं , उन्‍मादग्रस्‍त हो दौड़ लगातीं , तट की ओर। करती विलास , उन्‍मुक्‍त हास , गुंजायमान चहुँ ओर।   दूर कर सब विकार , श्‍वेत फेनिल , चरण धोक़र समा जातीं हैं किनारों में , हो जातीं एकाकार । संसार सागर की लहरें    हम काश ,  हम भी खोज पाते , अपने...

श्रद्धांजलि

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 श्रद्धांजलि एक अजीब भयभीत, डरावना-सा माहौल..... मन में एक अप्रत्याशित-सा भय, अनहोनी का डर....... आशंकाओं से ओत-प्रोत, वैचारिक लहरों का उद्वेग...... नकारात्मक विचारों पर, विराम की असफल कोशिश..... अपनों की बहुतायत अस्वस्थता, जीवन के लिए संघर्षरत, पल-पल विचलित करने वाली, अनचाही सूचनाओं का दौर.... और निरंतर, अपनों का, अपने बीच से दूर जाने का, अनवरत,हृदयविदारक क्रम...... अपने दिवंगत सहकर्मियों का सतत कर्तव्यबोध, उज्ज्वल चरित्र, कर्मशील, अनवरत निष्ठा, हँसमुख, राष्ट्र-निर्माता, जिनका मृत्यु ने किया निष्ठुर आकलन.... कर्तव्यपरायणता और उनकी स्मृतियों के बीच, उहापोह में फँसा मेरा व्यथित अंतर्मन ....... और इन सबसे व्युत्पन्न, मर्मस्पर्शी,असीम वेदना... इन तमाम झंझावातों के थपेड़ों की, उधेड़बुन में बरबस व्यस्त, उद्विग्न मन की व्यथा...... क्या कहूँ, किससे कहूँ, वह ओजस्वी वाणी, अचानक हो गई शांत.... बस फिर यही सोचा.......कि जो निश्चित है,उससे घबराहट कैसी? जो अवश्यंभावी है,उससे भय कैसा? तुमसे मिली जो सीख, तुम हो प्रकाश-पुंज, असीम प्रकाश.... हर हाल में स्थिर-प्रज्ञ,सम व तटस्थ रहना है जाने वालों को अलव...

आखिर सुख है कहां?

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  आखिर सुख है कहां ? आदमी के अस्तित्व की सबसे बड़ी असलियत संसार में उसका अकेलापन है। हमारा क्या होता है , हम जीते हैं या मरते हैं , खुशियाँ मनाते है या पीड़ा से कराहते हैं , इसका कोई प्रभाव सृष्टि पर नहीं पड़ता। सूरज , तारे , चाँद , धरती या हमारे आंगन में उगी घास या खिले फूल हमारी स्थिति से असंपृक्त अपने निर्दिष्ट जीवन-पथ पर बढ़ते चले जाते हैं। इस बात के एहसास ने पश्चिम में अस्तित्ववादी दर्शन की ओर झुकाव पैदा किया , जिसमें ऊब और अनास्था का दारुण स्वर सुनाई पड़ता है। आदमी ने कला , विज्ञान आदि के ज़रिए इस दुनिया को अर्थवान बनाकर एक सीमा तक अपने जीवन को भी अर्थवान यानी एक वृहत् डिजाइन का हिस्सा बनाने की कोशिश की है। लेकिन आदमी चाहे जो कल्पना कर ले , कभी भी प्रकृति के साथ संप्रेषण नहीं स्थापित कर सकता। उसके अकेलेपन को कोई सचमुच में अगर तोड़ सकता है , तो दूसरा आदमी ही। अपनी संपूर्ण अनुभूति में आदमी फिर भी अकेला है और कोई उपाय नहीं , जिससे वह अपनी पूरी अनुभूति को दूसरों को संप्रेषित कर सके। लेकिन एक सीमा के भीतर भावों से , शब्दों से , संगीत से वह अपनी आंतरिक पीड़ा या खुशी दूसरे मनुष्यों...