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Showing posts from April, 2022

चिर परिचित संगिनी हूँ

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    चिर परिचित संगिनी हूँ   यात्रा पर जाने की सारी तैयारी कर चुकी थी । सामान उठाकर मुख्य द्वार तक जाने ही वाली थी कि घर के कोने से एक आवाज़ आयी ,“ चिर परिचित संगिनी हूँ , मुझे भी साथ ले लो”.कदम यंत्रवत से उस कोने की ओर मुड गए , जहां अनुभव का अथाह सागर , ज्ञान , मनोरंजन , अध्यात्म , संस्कृति , सभ्यता , आचार-विचार आदि कई लहरों को समेटे मुझे पुकार रहा था। जी हाँ , यह मेरी पुस्तकों की दुनिया है । मैंने आलमारी खोल एक पुस्तक को बैग में रख लिया । चार पंक्तियाँ यूँ ही गुनगुना गई…………………………………………. टी.वी.कंप्यूटर के युग में क्यों बिसराएँ गुज़रते वक्त की हर आवाज़ इनमें सुनें हर पल कौन हमारे साथ चल सकता है ? इसलिए बेहतर है कि हम पुस्तक को चुनें ! सच है मनुष्य ज़िन्दगी भर सीखता है और इस प्रक्रिया में पुस्तकें अहम् भूमिका निभाती हैं । पुस्तकों की परम्परा अत्यंत प्राचीन है । सबसे पहली पुस्तक वेद थे । वेद ‘विद’ धातु से उद्धृत है जिसका अर्थ ही है ‘ज्ञान’ ऋग्वेद में उल्लिखित गायत्री मंत्र आज भी घर-घर में उच्चारित होते हैं , उपनिषद में से ही हमारे राष्ट्रीय प्रतीक का पवित्र वाक...

मांगी तपिश, तो ठंडक कैसे मिले?

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  मांगी तपिश , तो ठंडक कैसे मिले ?   रेत उड़ाते घूम रहे हैं हम , पत्तों पर खड़े होकर शाखें काट रहे हैं हम , रेगिस्तान की तैयारी है , और अब सपनों में बागों को देख रहे हैं हम॥ गौर कीजिएगा ज़्यादा पुरानी यादें नहीं है ये......   पेड़ों के पीछे छुपना...डालियों की मज़बूती का जायज़ा लेते हुए पेड़ों पर चढ़ जाना...लंबे मैदानों में भी बेखौफ दौड़ना...मुर्गियों के पीछे भागना...राह चलते मवेशियों के झुंड को हाथों से खेलते हुए उनके बीच में से निकल जाना... नदी के घाटों से पानी में छलांग लगाना...किसी छोटे तालाब पर पानी की सतह के नीचे पत्थर को यूं चलाने की होड़ लगाना कि छपाकों के अंतराल बनें...नहर की पुलिया पर बैठकर घंटों बिताना...अमराई और अमरूद के बगीचों में खेलना..अंगूर की बेल के तले खड़े होकर कच्चे अंगूरों के गुच्छोंके लिए ललचाना...नदी किनारे से ककड़ी लेकर नदी के पानी में धोकर खाना...सड़क किनारे के खेतों से हरे चने तोड़कर खाना...खेत से गन्ने लेकर चूसते हुए घूमना... रहट की आवाज़ें पहचानना...अहाते और आंगन का फ़र्क समझना...पेड़ों के नीचे बने चबूतरो पर वृक्ष-से बुजुर्गों के साए म...

नया सीखने-सोचने की ज़रूरत आखिर क्यों?

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  अंतर्राष्ट्रीय नवाचार दिवस पर विशेष... नया सीखने-सोचने की ज़रूरत आखिर क्यों ? प्रत्येक वस्तु या क्रिया में परिवर्तन , प्रकृति का नियम है। परिवर्तन से ही विकास के चरण आगे बढ़ते हैं। परिवर्तन एक जीवंत , गतिशील और आवश्यक क्रिया है , जो समाज को वर्तमान व्यवस्था के अनुकूल बनाती है। परिवर्तन जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में होते हैं। इन्हीं परिवर्तनों से व्यक्ति और समाज को स्फूर्ति , चेतना , ऊर्जा एवं नवीनता की उपलब्धि होती है। परिवर्तन युक्त वे सब साधन एवं माध्यम जिन्होंने व्यक्तियों के व्यवहार में नवीनता युक्त तथ्यों , मान्यताओं , विचारों का बीजारोपण करके नवीन प्रवृत्तियों की ओर उन्मुख किया , वे नवाचार कहलाते हैं। इस प्रकार परिवर्तन की प्रक्रिया विकासवादी , संतुलनात्मक एवं नवगत्यात्मक परिवर्तन से जुड़ी होती है। परिवर्तन एवं नवाचार एक दूसरे के अन्योन्याश्रित हैं। परिवर्तन समाज की मांग की स्वाभाविक प्रक्रिया से जुड़ा तथ्य है। इसलिए परिवर्तन , नवाचार और शिक्षा का आपसी संबंध इस प्रकार स्पष्ट किया जा सकता है कि नवाचार कोई नया कार्य करना ही मात्र नहीं है , वरन् किसी भी कार्य को नए तरीके से क...

हमारी संस्कृति, हमारी विरासत

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    हमारी संस्कृति , हमारी विरासत भारत एक प्राचीन भूमि है , इतनी प्राचीन जितना इतिहास स्वयं। इसमें ऐसी विशिष्टताएं हैं , जो इसे शेष विश्व से एक पृथक पहचान प्रदान करती है और दुनिया की सबसे पुरानी जीवित सभ्यता का मुकुट पहनाती है। देश सभ्यताओं से बनता है और सभ्यताएँ लोगों से तथा लोग अपनी शारीरिक विशेषताओं एवं नियमाचरण से। विकास क्रम में हमें प्रकृति से प्राकृतिक संसाधन एवं अपने पूर्वजों से संस्कृति प्राप्त हुई , जिसे हम अपनी सुविधानुसार ढालते गए। इस क्रम में हम अपनी मर्यादाओं को जाने-अनजाने लांघते ही रहे। परिणामस्वरूप , आज हम   विकट परिस्थिति में जी रहे हैं। प्रकृति ने मनुष्य को बुद्धि , ज्ञान एवं कौशल से संपन्न कर श्रेष्ठता की उपाधि से विभूषित किया है , इसलिए नहीं , कि हम स्वार्थी होकर सभी संसाधनों का दोहन करें , बल्कि इसलिए कि प्रकृति-प्रदत्त तथा हमारे पूर्वजों के अथक एवं अद्वितीय प्रयासों से उद्भूत हुई विरासत का संरक्षण एवं विकास कर सकें। अक्सर विरासत का अभिप्राय सांस्कृतिक गतिविधियों एवं ऐतिहासिक महत्ता की वस्तुओं से लगाया जाता है , लेकिन गहनता से अवलोकन करने...

अहा ज़िंदगी!

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अहा ज़िंदगी! जीवन क्या है? खेल, आनंद, पहेली या बस.. सांसों की डोर थामे उम्र के सफर पर बढ़ते जाना? ये साधना है या यातना? सुख है या उलझाव? जीवन का अर्थ कोई भी, पूरी तरह, कभी समझ नहीं पाया है, लेकिन इसकी अनगिनत परिभाषाएं सामने आती रही हैं। हम अलग-अलग समय में ज़िंदगी के मूल्यों को परखते रहते हैं, उनका अर्थ तलाशने की कोशिशों में जुटे रहते हैं। हालांकि एक बात आपने कभी गौर की है कि ज़िंदगी को परखने की कोशिश में हम एक महत्वपूर्ण बात भूल जाते हैं और वह यह है कि जीवन की विशिष्ट परिभाषाएं दरअसल, हमारे सामान्य होने में छुपी हैं। इनमें से ही एक अहम बात है प्रकृति से हमारा जुड़ाव। कुदरत का मतलब मिट्टी, पानी, पहाड़, झरने तो है ही, पांचों तत्व भी तो प्रकृति से ही मिले हैं। हमारी देह में, हमारे दुनियावी वजूद में शामिल पंच तत्व। और फिर, दुनिया में अगर हम मौजूद हैं, तो प्रकृति की नियामतों के बिना कैसे जिएंगे? क्या सांस न लेंगे?  तरह-तरह के फूलों की खुशबुओं से मुलाकात न करेंगे?  भोजन और पानी के बगैर कैसे गुज़रेगी जीवन की रेलगाड़ी?  तो आइए, आज प्रकृति के संग-संग ही तलाशते हैं अपनी ज़िं...

सोशल मीडिया के दुष्प्रभाव

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  सोशल मीडिया के दुष्प्रभाव सोशल मीडिया का सही उपयोग किसी वरदान से कम नहीं , लेकिन इसका असंयमित प्रयोग हमारे अंदर कई तरह की मानसिक समस्याओं को जन्म दे सकता है। इस कारण युवाओं में चिड़चिड़ापन , नींद न आना , चिंता , तनाव , अवसाद , छोटी-छोटी बात में गुस्सा आ जाना जैसी अनेक मानसिक समस्याएं उत्पन्न हो रही हैं। सोशल मीडिया का सही सदुपयोग किया जाए , तो यह सरकार और जनता की आंखें खोलने का एक मजबूत प्लेटफॉर्म है। किन्तु ऐसा नहीं हो रहा है। इसका बहुत से लोग दुरुपयोग कर रहे हैं , जिसके दुष्परिणाम आम लोगों को अफवाहों के रूप में भुगतने पड़ रहे हैं। हर उपयोगकर्ता ठीक नहीं होता। आज के दौर में सोशल मीडिया का इस्तेमाल सामान्य बात हो चली है। इसे जरूरत मान लिया गया , लेकिन इसके नुकसानों से रूबरू होना भी जरूरी है। एक हालिया अध्ययन के जरिए सिडनी के वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि सोशल मीडिया के इस्तेमाल के करीब पचास हानिकारक प्रभाव हैं। यह सभी प्रभाव सिर्फ मानसिक सेहत से जुड़े नहीं हैं , बल्कि हमारे काम करने की क्षमता भी इनसे प्रभावित हो रही है। सिडनी की यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्नोलॉजी के शोधकर्ताओं ने ...