चिर परिचित संगिनी हूँ
चिर परिचित संगिनी हूँ यात्रा पर जाने की सारी तैयारी कर चुकी थी । सामान उठाकर मुख्य द्वार तक जाने ही वाली थी कि घर के कोने से एक आवाज़ आयी ,“ चिर परिचित संगिनी हूँ , मुझे भी साथ ले लो”.कदम यंत्रवत से उस कोने की ओर मुड गए , जहां अनुभव का अथाह सागर , ज्ञान , मनोरंजन , अध्यात्म , संस्कृति , सभ्यता , आचार-विचार आदि कई लहरों को समेटे मुझे पुकार रहा था। जी हाँ , यह मेरी पुस्तकों की दुनिया है । मैंने आलमारी खोल एक पुस्तक को बैग में रख लिया । चार पंक्तियाँ यूँ ही गुनगुना गई…………………………………………. टी.वी.कंप्यूटर के युग में क्यों बिसराएँ गुज़रते वक्त की हर आवाज़ इनमें सुनें हर पल कौन हमारे साथ चल सकता है ? इसलिए बेहतर है कि हम पुस्तक को चुनें ! सच है मनुष्य ज़िन्दगी भर सीखता है और इस प्रक्रिया में पुस्तकें अहम् भूमिका निभाती हैं । पुस्तकों की परम्परा अत्यंत प्राचीन है । सबसे पहली पुस्तक वेद थे । वेद ‘विद’ धातु से उद्धृत है जिसका अर्थ ही है ‘ज्ञान’ ऋग्वेद में उल्लिखित गायत्री मंत्र आज भी घर-घर में उच्चारित होते हैं , उपनिषद में से ही हमारे राष्ट्रीय प्रतीक का पवित्र वाक...