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स्टूडेंट्स का स्ट्रेस

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स्टूडेंट्स का स्ट्रेस    कोरोना वायरस से बचाव के लिए पूरे भारत में  लॉकडाउन है. लोग घरों में बंद हैं और सब कुछ जैसे रुका हुआ है ।भागती-दौड़ती ज़िंदगी में अचानक लगे इस ब्रेक और कोरोना वायरस के डर ने लोगों के मानसिक स्वास्थ्य पर प्रभाव डालना शुरू कर दिया है ।इस बीच चिंता, डर, अकेलेपन और अनिश्चितता का माहौल बन गया है और लोग दिन-रात इससे जूझ रहे हैं.कोरोना लॉकडाउन के समय में सारी दुनिया का बुरा और विचित्र हाल है। पहले कोरोना फिर उसके बाद में होने वाले प्रभाव का डर सबको भयभीत कर रहा है। सब अपने-अपने तरीके से कोरोना को मात देने की कोशिश कर रहे हैं।अगर इस समय विद्यार्थियों की तरफ देखें, तो यह समय उनके लिए बड़ा  ही उदासी, अवसाद और तनाव भरा है।  वही विद्यार्थी जो स्कूल, कालेज में बंक करके खुशी महसूस करते थे या छुट्टी की इंतज़ार करते थे, आज स्कूल, कालेज के खुलने का ​बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं। अभी  ऑनलाइन क्लासें लग रही हैं, मीट,जूम या अन्य वर्चुअल प्लेटफ़ॉर्मों पर क्लासें लग रही हैं, वीडियो कांफ्रैंसिंग हो रही है, मीटिंग हो रही है, परन्तु फिर भी बहुत कुछ सूना और अधू...

कुछ ऐसी बातें जो आपके रिश्तों में मिठास घोल देंगी

  कुछ ऐसी बातें जो आपके रिश्तों में मिठास घोल देंगी   रूठे सुजन मनाइए , जो रूठे सौ बार। रहिमन फिरि - फिरि पोहिए , टूटे मुक्ताहार।। प्रस्तुत दोहे में महाकवि रहीम कहते हैं कि जब भी कोई हमारा अपना प्रियजन हमसे रूठ जाए , तो उसे मना लेना चाहिए , भले ही हमें उसे सौ बार ही क्यों ना मनाना पड़े , प्रियजन को अवश्य ही मना लेना चाहिए। रहीम इस दोहे के माध्यम से हमें प्रियजनों के महत्त्व को बता रहे हैं। वे कहते हैं कि जिस प्रकार मोतियों की माला के बार - बार टूटने पर भी हर बार मोतियों को पिरोकर हार बना लिया जाता है , वैसे ही हमें भी प्रियजनो को मना लेना चाहिए। मैं रहीम के संदेश का समर्थन करती हूँ क्योंकि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है । रिश्ते केवल सामाजिक व्यवस्थाओं की धुरी ही नहीं हैं , वे इंसानियत के क्रमशः विकास के महत्वपूर्ण उत्प्रेरक भी हैं। बिना समाज के , बिना परिवार के या बिना रिश्तों के वह रह ही नहीं सकता । रिश्तों की नाज़ुक डोर ...