स्टूडेंट्स का स्ट्रेस


स्टूडेंट्स का स्ट्रेस


  


कोरोना वायरस से बचाव के लिए पूरे भारत में  लॉकडाउन है. लोग घरों में बंद हैं और सब कुछ जैसे रुका हुआ है ।भागती-दौड़ती ज़िंदगी में अचानक लगे इस ब्रेक और कोरोना वायरस के डर ने लोगों के मानसिक स्वास्थ्य पर प्रभाव डालना शुरू कर दिया है ।इस बीच चिंता, डर, अकेलेपन और अनिश्चितता का माहौल बन गया है और लोग दिन-रात इससे जूझ रहे हैं.कोरोना लॉकडाउन के समय में सारी दुनिया का बुरा और विचित्र हाल है। पहले कोरोना फिर उसके बाद में होने वाले प्रभाव का डर सबको भयभीत कर रहा है। सब अपने-अपने तरीके से कोरोना को मात देने की कोशिश कर रहे हैं।अगर इस समय विद्यार्थियों की तरफ देखें, तो यह समय उनके लिए बड़ा  ही उदासी, अवसाद और तनाव भरा है।  वही विद्यार्थी जो स्कूल, कालेज में बंक करके खुशी महसूस करते थे या छुट्टी की इंतज़ार करते थे, आज स्कूल, कालेज के खुलने का ​बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं। अभी  ऑनलाइन क्लासें लग रही हैं, मीट,जूम या अन्य वर्चुअल प्लेटफ़ॉर्मों पर क्लासें लग रही हैं, वीडियो कांफ्रैंसिंग हो रही है, मीटिंग हो रही है, परन्तु फिर भी बहुत कुछ सूना और अधूरा लग रहा है।

कोरोना  ने हमारे बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित किया है। यह कड़वा सच है कि कोरोना काल में घर पर रह कर बच्चे चिड़चिडे़ हो गए हैं। 6 से 12 साल के बच्चों पर ज़्यादा असर देखने को मिल रहा है। बच्चों में डिप्रेशन के लक्षण दिख रहे हैं। शारीरिक गतिविधियों के बंद होने से बच्चों की दिनचर्या बदली है। बच्चों के बर्ताव में बदलाव दिख रहा है। स्कूल न जाने से भी बच्चों पर असर पड़ रहा है। कब स्कूल जाएंगे, यह पता नहीं है। बच्चे भयभीत,आशंकित और एकाकीपन के गंभीर गह्वर में डूबते जा रहे हैं।बच्चों का बाहर खेल-कूद, मिलना-जुलना नहीं हो पा रहा है। बाज़ार, मॉल, रेस्टोरेंट जाना बंद है। छुट्टियों में बाहर घूमने जाना भी बंद है। बच्चे वर्चुअल और आर्टिफिशियल दुनिया में ही जी रहे हैं। उनकी पढ़ाई के लिए ऑनलाइन माथापच्ची हो रही है। बैठे-बैठे वजन बढ़ता जा रहा है।

कोविड के दौर में अभिभावकों को  असीमित चिंताएं घेरे रहती हैं।  कोविड और मां-बाप के चिंतित चेहरे बच्चों के लिए भी तनाव का कारण हैं। अकेलापन और बुरी खबरों का तनाव भी बच्चों पर हावी दिख रहा है। इन स्थितियों में बच्चों में चिड़चिड़ापन, आक्रोश, दुखी चेहरा आम बात होती जा रही है। बच्चों में अचानक कम या बहुत ज्यादा नींद की शिकायतें भी मिल रही हैं। बच्चों में मायूसी, कोशिश किए बिना हार मान लेने की आदत देखने को मिल रही है। इसके अलावा थकावट, कम एनर्जी, एकाग्रता में कमी की शिकायतें भी मिल रही हैं। बच्चों में गलती पर खुद को ज्यादा कसूरवार ठहराना, सामाजिक गतिविधियों से दूरी बनाना, दोस्तों, रिश्तेदारों से कम घुलना-मिलना जैसे लक्षण भी देखने को मिल रहे हैं। जानकारों का कहना है कि  छह साल से बड़े बच्चों में डिप्रेशन घर करता जा रहा है।

अभिभावक तीन चीज़ों से पहचान सकते हैं कि बच्चा तनाव है-

पहला है व्यवहार में परिवर्तन - जैसे बच्चा कहे कि मैं अच्छा नहीं हूं मैं बेकार हूं, बात - बात में गुस्सा कर, रोए जोर-जोर से बातें करें । घबराहट व चिड़चिड़ापन महसूस हो। हाथ पैरों को बिना बात के फेंके आदि।

दूसरा सिम्टम है चेंज ऑफ एक्टिविटीज- जैसे सोते हुए अचानक जगना, समय से पहले जगना, कम बोलना या ज़्यादा बोलना।

तीसरा- परफॉर्मेंस में गिरावट आना जैसे ऑनलाइन क्लास में मन न लगना, होमवर्क न करना, पढ़ाई की बात न करना, अगर आप उससे बात करें तो वह अनदेखा करें आदि।

इन स्थितियों से निपटने के किए सबसे पहले बच्चों को दुखी न होने दें,अभिभावक उनके जीवन में शामिल हों, उन्हें बुरे एहसास मैनेज करना सिखाएं, बच्चे के दोस्तों की जानकारी रखें, बच्चे को नज़रअंदाज न करें,उनसे लगातार बात करते रहें,बच्चों से बातचीत में आशावादी रहें, उनकी दिनचर्या में फिजिकल एक्टिविटी और योग को शामिल करें। ये बिंदु देखने में भले ही छोटेलगें,पर हैं नहीं । इनका अभिभावकों द्वारा परिपालन अत्यंत महत्वपूर्ण है।बच्चे से हरदम पढ़ाई की ही बात न करें, बल्कि उसके साथ थोड़ी देर टहलें या फिर खेलें। अन्य एक्टिविटी करने से बच्चे का मूड फ्रेश होता है, जिससे वह बेहतर तरीके से परफॉर्म करते हैं। अमूमन माता-पिता बच्चों से सिर्फ पढ़ाई की ही बात करते हैं, जिससे बच्चा परेशान हो जाता है। यकीनन इस समय बच्चों को अतिरिक्त पढ़ाई करने की जरूरत होती है, लेकिन इसके लिए ज़रूरी है कि आप एक स्टडी प्लान बनाएं। मसलन, बच्चा पूरे दिन में कितनी देर पढ़ाई करेगा और उसे कितनी देर का ब्रेक लेना है। एक बार में वह कितने पार्ट को कवर करेगा, इन सबकी प्लानिंग पहले ही कर लें।  बच्चे के स्क्रीन टाइम का भी ध्यान रखें।  इस तरह जब अभिभावक पहले से ही सारी प्लानिंग कर लेंगे, तो इससे बच्चों का भी तनाव कम होगा। यहाँ-पान का ध्यान रखें। साथ ही लिक्विड की मात्रा अधिक रखें और उसे हेल्दी स्नैक्स जैसे रोस्टेड बादाम या मखाना आदि दें। इतना ही नहीं, उनका संतुलित खान-पान बच्चों के तनाव को दूर करता है। अगर बच्चा पढ़ाई को लेकर अतिरिक्त तनाव में है तो आप उसके साथ मिलकर कुछ रिलैक्सेशन एक्टिविटी कर सकते हैं।  

अभिभावकों की जिम्मेदारी है कि वे समय रहते अपने बच्चों के अंदर बढ़ रहे तनाव को पहचान कर उसका उचित इलाज कराएं। बच्चों में पैदा हो रहे तनाव को चार तरीकों से दूर किया जा सकता है-माता - पिता बच्चों के अंदर चल रही बातों को पहचानने। प्यार से उनकी बात सुने और महत्व दें। कभी भी बच्चों को अकेला महसूस न होने दें। रिसर्च कहती है कि अच्छी डाइट का मानसिक स्वास्थ्य पर सीधा प्रभाव पड़ता है। खाने में सलाद फाइबर डाइट के साथ-साथ दिन में एक सेब जरूर लें। सेब एंटी ऑक्सीडेंट होता है जो ऑक्सीडेशन डैमेज में मदद करता है।  6 से 12 साल के बच्चों को 9 से 11 घंटे की नींद लेनी चाहिए,जिससे तनाव का स्तर घटता है। इसके अलावा मास्क, सामाजिक दूरी व साफ सफाई का पूरा ध्यान रखें टीवी, मोबाइल कम उपयोग करें। पर्यावरण स्वास्थ्य का ध्यान रखें। खेलकूद के कारण खुशी देने वाला हार्मोन एंडोर्फिन निकलता है जिससे नकारात्मक विचार कम होते हैं और तनाव का स्तर घटता है। छोटे बच्चों को 25 से 30 मिनट ज़रूर खेलना चाहिए इससे उनका आत्मविश्वास और सामाजिक रुझान भी बढ़ता है।यदि बच्चे खेलने के लिए घर से बाहर नहीं जा सकते,तो घर में ही जॉगिंग, स्किप्पिंग आदि आराम से की जा सकती है।

मैं ऐसा मानती हूँ कि कोरोनावायरस के इस मंथन काल से निकला यह स्निग्ध पीयूष समाज को एक नई दिशा देगा अंत में यही कहा जा सकता है कि भारतीय महिला एक सशक्त व्यक्तित्व के रूप में उठेगी और उसके आत्मविश्वास से समस्त भारतीय समाज आलोकित होगा और एक नया पथ प्रशस्त होगा क्योंकि-

इन काली सदियों के सर से जब रात का आँचल ढलकेगा

जब दुख के बादल पिघलेंगेजब सुख का सागर छलकेगा

जब अंबर झूम के नाचेगाजब धरती नग़में गाएगी

वो सुबह हमीं से आएगीवो सुबह हमीं से आएगी

वो सुबह हमीं से आएगीवो सुबह हमीं से आएगी


AMRIT VICHAR DATE 02.06.2021




 


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