निकलेगी अमृत-धारा

निकलेगी अमृत-धारा






जीवन की इस आपाधापी में,

एक ही गलती थी काफ़ी,

पर हम तो मनुष्य ठहरे, 

समर्थ !

शक्तिवान ! 

धरा पर गंगा उतारने वाले !

हम गलती पर गलती करते गए,

और पता ही नहीं चला कि कब

कांटों से झोली भरते गए।


जंगल भी काटे हमने,

पर्वतों को भूरा किया,

नदियों की धारा मोड़ीं,

नहर-झील-ताल सब पाटे हमने,

जीवन से ही कभी जाने, कभी अनजाने लड़ते गए,

हम गलती पर गलती करते गए,

और पता ही नहीं चला कि कब

कांटों से झोली भरते गए।


गांवों में शहर भरा हमने,

हवा में ज़हर भरा हमने,

चाँदनी में दोपहर भरा हमने,

ख़ुशहाली में कहर भरा  हमने,

अहंकार के सोपानों पर चढ़ते गए,

हम गलती पर गलती करते गए,

और पता ही नहीं चला कि कब

कांटों से झोली भरते गए।


भौतिकता का दौर अच्छा लगता है,

विज्ञान का तौरअच्छा लगता है,

तेरी-मेरी का शोर भी अच्छा लगता है,

दौलत हो बहुतेरी, तो और भी अच्छा लगता है,

जीते-जी मौत के प्रतिमानों को गढ़ते गये।

हम गलती पर गलती करते गए,

और पता ही नहीं चला कि कब

कांटों से झोली भरते गए।

क्या मिल सकेगी कभी मुक्ति हमें ?

क्या आज के दौर के लिए हम ज़िम्मेदार नहीं?

क्या मानवता के हम पहरेदार नहीं ?

कोई तो सुझाए, कोई युक्ति हमें ! 


बस बहुत हुआ.....

अब अपनी अधखुली आंखों से देख दुनिया का नज़ारा, 

हर अनजान चेहरा भी लगाने लगा है हमें प्यारा, 

जाग गई है मानवता, 

देर से ही सही,

अब कोई तो पर्वत हिलेगा, 

निकलेगी अमृत-धारा।।

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