*खंड-खंड में बंटना, प्रवृत्ति नहीं है हमारी* (इतिहास के झरोखों से वर्तमान तक) कुछ तो बात है कि हस्ती, मिटती नहीं हमारी। सदियों रहा है दुश्मन, दौर-ए-ज़हां हमारा।। सारे जहाँ से अच्छा, हिंदोस्तां हमारा । हम बुलबुलें हैं इसकी,ये गुलिस्तां हमारा ॥ इतिहास गवाह है कि सैकड़ों वर्षों तक किस प्रकार विदेशी आक्रांताओं ने भारतीय जनसमूह की भावनाओं को किस प्रकार रौंदा है। जवाहर लाल नेहरू की पुस्तक” डिस्कवरी ऑफ इंडिया’ के अनुसार जब फ़तेह हासिल करने वालों का यह कायदा था कि हारे हुए लोगों को या तो गुलाम बना लेते थे या उन्हें बिल्कुल मिटा देते थे, तब वर्ण-व्यवस्था ने एक शांतिवाला हल पेश किया और बढ़ते हुए धंधे के बंटवारे की ज़रूरत ने इसमें मदद पहुंचाई। समाज में दर्ज़े कायम हुए। किसान जनता में से वैश्य बने, जिनमें किसान, कारीगर और व्यापारी लोग शामिल थे। क्षत्रिय हुए, जो हुकूमत करते थे या युद्ध करते थे। ब्राह्मण बने, जो पुरोहिती करते थे, विचारक थे, जिनके हाथ में नीति की बागडोर थी और जिनसे यह उम्मीद की जाती थी कि वे जाति के आदर्शों की रक्षा करेंगे। इन तीनों वर्णों के नीचे शूद्र थे, जो मज़दूरी या...