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Showing posts from October, 2025
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 *खंड-खंड में बंटना, प्रवृत्ति नहीं है हमारी*  (इतिहास के झरोखों से वर्तमान तक) कुछ तो बात है कि हस्ती, मिटती नहीं हमारी। सदियों रहा है दुश्मन, दौर-ए-ज़हां हमारा।। सारे जहाँ से अच्छा, हिंदोस्तां हमारा । हम बुलबुलें हैं इसकी,ये गुलिस्तां हमारा ॥  इतिहास गवाह है कि सैकड़ों वर्षों तक किस प्रकार विदेशी आक्रांताओं ने भारतीय जनसमूह की भावनाओं को किस प्रकार रौंदा है। जवाहर लाल नेहरू की पुस्तक” डिस्कवरी ऑफ इंडिया’ के अनुसार जब फ़तेह हासिल करने वालों का यह कायदा था कि हारे हुए लोगों को या तो गुलाम बना लेते थे या उन्हें बिल्कुल मिटा देते थे, तब वर्ण-व्यवस्था ने एक शांतिवाला हल पेश किया और बढ़ते हुए धंधे के बंटवारे की ज़रूरत ने इसमें मदद पहुंचाई। समाज में दर्ज़े कायम हुए। किसान जनता में से वैश्य बने, जिनमें किसान, कारीगर और व्यापारी लोग शामिल थे। क्षत्रिय हुए, जो हुकूमत करते थे या युद्ध करते थे। ब्राह्मण बने, जो पुरोहिती करते थे, विचारक थे, जिनके हाथ में नीति की बागडोर थी और जिनसे यह उम्मीद की जाती थी कि वे जाति के आदर्शों की रक्षा करेंगे। इन तीनों वर्णों के नीचे शूद्र थे, जो मज़दूरी या...

धड़कनों की ख़ामोशी

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  यह रहा एक मार्मिक और भावनात्मक गीत, जो स्टेथीसकोप की धड़कनों के माध्यम से उस अनकही पीड़ा को उजागर करता है, जिसे अक्सर लोग सुन नहीं पाते — भले ही यंत्र कानों से लगा हो, पर मन की आवाज़ अनसुनी रह जाती है: 🎵 "धड़कनों की ख़ामोशी" 🎵 धड़कनों की ये सदा, कोई क्यों नहीं सुनता, स्टेथीसकोप कानों पे, फिर भी मन क्यों है चुप सा। साँसों की हर थरथराहट, कुछ कहना चाहती है, पर भीड़ में ये आवाज़ें, अक्सर खो जाती हैं। कभी दिल चीखता है, पर कोई सुनता नहीं, धड़कनों की ख़ामोशी को, कोई पढ़ता नहीं। यंत्र तो है पास में, पर जुड़ाव  हैकहाँ, इंसानियत की भाषा का, अभाव है यहाँ । साँसों की हर थरथराहट, कुछ कहना चाहती है, पर भीड़ में ये आवाज़ें, अक्सर खो जाती हैं। कभी माँ की ममता काँपे, बुख़ार में बच्चे का हाल, डॉक्टर देखे तापमान, पर न देखे माँ का हाल। कभी वृद्ध की आँखों में, बीते कल की पीड़ा हो, पर रिपोर्ट की रेखाओं में, वो दर्द कहाँ लिखा हो। साँसों की हर थरथराहट, कुछ कहना चाहती है, पर भीड़ में ये आवाज़ें, अक्सर खो जाती हैं। कभी दिल चीखता है, पर कोई सुनता नहीं, धड़कनों की ख़ामोशी को, कोई ...

नानी आईं सपनों में

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 नानी आईं सपनों में नानी आईं सपनों में, चाँदनी लिपटी आँगन में, धीरे बोलीं — “मत रो बिटिया, मैं हूँ तेरे हर क्षण में...” नानी आईं... सपनों में... रात थी गहरी, चाँद था सोया, मन था मेरा बिल्कुल खोया, अचानक कोई छुअन सी आई, माँ जैसी वो ममता रोई। वो बोलीं — “डरना मत बेटी, साथ तेरे मैं हर मोड़ पे खड़ी ।” नानी आईं सपनों में... चाँदनी लिपटी आँगन में... गोद में उनकी लोरी गूंजे, आँखों में बचपन फिर पूजे, कानों में वो कहती जातीं — “सच्चे दिल से राह बनातीं। जीवन में जब अँधियारा हो, दीपक बनकर  तू जगमगाती।” नानी आईं सपनों में... प्रीत घुली हर कण में... कहने लगीं — “तेरी मुस्कानें, मेरे गीतों की पहचानें, तेरे आँसू मोती जैसे, उनसे सींचे मेरे गाने।” फिर बोलीं — “प्यार बाँटती रह, तू जग में  मेरी निशानी ।” नानी आईं सपनों में... सुगंध बसी हर मन में... मैंने कहा — “नानी, मत जाओ, कुछ पल और पास ठहर जाओ।” वो मुस्काईं — “जीवन पथ है, हर मिलन में बिछोह समाओ।” “जब दीपक जलता तेरे घर, समझना मैं भी मुस्कराओ।” नानी आईं सपनों में... धड़कन बन हर क्षण में... हर दीये की लौ में झिलमिल, नानी रहतीं मन में... नानी...

हर रंग कुछ कहता है 🎵

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  हर रंग कुछ कहता है 🎵 हर रंग कुछ कहता है, जीवन का राग बहता है, कभी आँसू बन झरता है, कभी मुस्कान सा रहता है। लाल रंग बोले — “प्रेम जलाओ, दिल की लौ में दीप जलाओ।” आग भी मैं, अरमान भी मैं, संघर्षों का सम्मान भी मैं। नीला रंग गगन से बोले, “गहराई को दिल में तोले।” शांत रहो पर मौन न बनो, हर लहर में जीवन चुनो। हरा रंग खेतों में गाए, “थके दिलों में स्वप्न जगाए।” सूखी मिट्टी में नव आशा, जीवन की सबसे मधुर भाषा। पीला कहे — “उजाला बाँटो, सूरज बनो, अँधेरा हाँटो।” हँसी से रंग भरो जहां में, सूर्य समान रहो सदा मन में। सफेद कहे — “निर्मल रहो, सच की राह पर अडिग रहो।” पवित्रता ही सबसे सुंदर, मन उजला तो जग सुगंधर। काला कहे — “मत डर छाया से, उजियारा जन्मे परछाया से।” हर अंत में आरंभ छिपा है, जीवन भी तो चित्र बना है। हर रंग कुछ कहता है, जीवन का राग बहता है, जो सुन ले इनका संगीत, वो खुद प्रभात बन रहता है।

जब चाँद हासिल हो जाता है

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  जब चाँद हासिल हो जाता है जब चाँद हासिल हो जाता है, अँधेरा पीछे छूट जाता है, जो डर था रातों के सन्नाटे में, वो अब कहानी बन जाता है। जब चाँद हथेली पर झिलमिलाए, दिल कुछ पल को ठहर-सा जाए, जो चाहत थी बरसों की धड़कन, वो पल में ही धुँधला जाए। जब चाँद नज़रों से लग जाता है, सूना आसमान तो लजाता है, जो सपना इतना उजला था, वो मिलके फीका पड़ जाता है। जब चाँद सिरहाने चमक उठे, तो तारे ग़म में छिप जाते हैं, जो मन ने सपने देखे पाने के, वो मिलने पर बिखर जाते हैं। जब चाँद हासिल हो जाता है, तो चाहत का रहस्य खुल जाता है, पाना नहीं, खोना कठिन होता — यही प्रेम का सच कहलाता है।

माँ की साड़ी

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  माँ की साड़ी बक्से में सोई है, मलमल की ओट में , इत्र की खुशबू , तहों में है चोट। ओ माँ की साड़ी , ओ माँ की साड़ी , तेरी हर लहर में बसी माँ की झांकी।   तकिए के नीचे है इस्त्री का जहाँ , कपूर और धूप से महका गगन। ओ माँ की साड़ी , ओ माँ की साड़ी , तेरी हर तह में है पूजा की बाड़ी।   चूड़ियों की झंकार , कसकर खोंसा पल्लू , काम की उमंग है , मन का उल्लास। रेखाएँ पल्लू पर जैसे सत्य के पुल , दुष्ट को हराने का माँ का विश्वास।   ओ माँ की साड़ी , ओ माँ की साड़ी , तेरे रंगों में रानी की आभा प्यारी।   गांठों में छिपे हैं रहस्य अनगिन , खजाने से भरे हैं हर मोड़ के बिन। पीली मधुरा , हरी कगार , माँ के संग खिलता है प्यार।   ओ माँ की साड़ी , ओ माँ की साड़ी , लपेटूँ तो बढ़ती ही जाती अटारी।   कभी मैं नन्हीं , तुझको नापा , ओढ़ा , तो पाया तू अंतहीन छापा। आम , काजू , गेहूँ के दाने , नववर्ष के सपने पुराने।   ओ माँ की साड़ी , ओ माँ की साड़ी , तेरी गंध में बसी है ऋतुओं की क्यारी।   तारों से जगमग तेरा रू...

पुस्तक समीक्षा: ‘चौदह फेरे’ – शिवानी

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जनरेशन अल्फ़ा और सिक्स-पॉकेट सिंड्रोम

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जनरेशन अल्फ़ा और सिक्स-पॉकेट सिंड्रोम भारत और दुनिया के बदलते समाज में बच्चों के परवरिश , शिक्षा और मनोवैज्ञानिक व्यवहारों पर जो नए शब्द और विचार उभर रहे हैं , उनमें “जनरेशन अल्फ़ा” और “सिक्स-पॉकेट सिंड्रोम” दो शब्द ऐसे हैं , जो अब संवाद , नीतियों और परिवारों की चिंताओं का केंद्र बनते जा रहे हैं। जनरेशन अल्फ़ा वे बच्चे हैं जो लगभग 2010 के बाद जन्मे हैं। वे पूरी तरह से डिजिटल-इन्फ्रास्ट्रक्चर , स्मार्ट डिवाइस और इंटरनेट-उन्मुख माहौल में पले-बढ़े हैं। इस पीढ़ी में जन्मजात डिजिटल सहजता है | टेक-उपकरणों का प्रयोग और उनसे सीखना इस पीढ़ी के लिए स्वाभाविक है। वे त्वरित मान्यता और त्वरित फीडबैक की चाह भी रखते हैं | सोशल मीडिया , गेम रिवार्ड और ऑनलाइन रिएक्शन ने त्वरित मान्यता की अपेक्षा बढ़ा दी है। मल्टीमीडिया उनकी उंगलियों का खेल है | वे विजुअल , वीडियो और इंटरेक्टिव माध्यमों से सीखने को प्राथमिकता देते हैं। उनके इस आचार-व्यवहार पर वैश्विक संपर्क और बहुसांस्कृतिक छाप भी खूब पड़ी है | ऑनलाइन कंटेंट के कारण उनके अनुभवों में वैश्विक सांस्कृतिक प्रभाव मिश्रित हो जाता है। यह पीढ़ी तकनीक-संवर्धित , क...