EPISODE-20 बहती हवा-सा था वो...09/10/26

 

EPISODE   20       

बहती हवा सा था वो...09/10/26

INTRO MUSIC

नमस्कार दोस्तों! मैं मीता गुप्ताएक आवाज़एक दोस्तकिस्से कहानियाँ सुनाने वाली आपकी मीत। जी हाँआप सुन रहे हैं मेरे पॉडकास्ट, ‘यूँ ही कोई मिल गया’ के दूसरे सीज़न का अगला एपिसोड ..जिसमें हैंनए जज़्बातनए किस्सेऔर कुछ मन पर छप गईं यादें..उसी मखमली आवाज़ के साथ..।जी हाँ दोस्तोंआज हम बात करेंगे संघर्ष कीप्रयत्न कीप्रयास की और धैर्य की। सब ठीक हो जाएगाऐसा ही सोचकर जो भी हालात हमारे सामने हैंजो भी वस्तुस्थितियाँ सामने आ रही हैंउनके अतीत के कारण और हिसाब हमारे पास हैंपरंतु क्या अब हम अपने अतीत को बदल सकते हैं?... जी नहीं, नहीं ना?... तो जो बीत गयासो बात गई..उसके बारे में क्यों सोचेंहमारे पास जो अभी बकाया हैजो खर्च नहीं हुआ वो अभी भी शेष है नावही हमारा वर्तमान है और भविष्य की संभावनाएँ भी। बात असल में दिल के बहुत करीब है। जीवन पथ पर चलते चलते हमें कई ऐसे लोग मिलते हैंजो अपनी अमिट छाप आपके दिल पर छोड़ जाते हैंऐसे ही थे बाबा..बाबा, नाम तो कभी जाना ही नहीं उनका, वे बस बाबा थे, जगत बाबा, यूनिवर्सल बाबा।  

MUSIC  

मैं अक्सर उस सड़क से गुज़रा करती थी। उस सड़क पर न जाने क्या आकर्षण थाजब जब गुज़रतीतब तब बाईं ओर ज़रूर देखती। वैसे तो बाईं ओर ऐसा कुछ खास था नहींपर फिर भी वहाँ कुछ तो ऐसा था, जो मुझे आकर्षित करता। एक बड़ा सा तंबू सड़क के किनारे लगा थाउस तंबू के बीचोंबीच सिलाई की एक पुरानी मशीन रखी थी, कुछ ज़ंक लगी, स्याह सी..और इन सबके बीच अनगिनत झुर्रियाँ लिए हुए खिचड़ी बालों वाले एक बुज़ुर्ग...एक वृद्ध, वहाँ बैठकर कुछ सिला करते, दिनभर..। तंबू के आसपास कहीं फटे हुए बैगकहीं सिले हुए कपड़ों की गठरीकहीं कुछ धागे और कहीं और ऐसा सामानजो देखने में कूड़ा करकट लगतापड़ा रहता। साल के हर मौसम में वे बुज़ुर्ग वहीं बैठा करते सर झुकाए सिलाई की मशीन की सुई में अपनी धुंधली आँखों से बड़े ही जतन से धागा डालते हुएकुछ सिलते हुए दिखाई देते। घर में अक्सर ऐसा हो ही जाता है कि कभी कोई बैग फट गयाकभी कभी कोई कपड़ा उधड़ गयाऔर ऐसी फटी हुई चीज़ों और उधड़न को संवारने का काम करते थेवे बुज़ुर्ग, बाबा। मैं अक्सर कुछ ना कुछ सिलवाने के लिए उनके पास जाया करती...वे बड़े प्यार से मुझे देखते। अक्सर टूटी हुई बेंच को दिखाकर कहतेबिटियायहाँ बैठ जाओअभी करके देता हूँ। मैं सोचती चारों ओर गर्म हवाएँ चल रही हैं...मैं यहाँ बैठ गई तोतप जाऊँगी..जल जाऊँगी, पर वे, वे एक निष्काम योगी की तरह गरम हवाओं के थपेड़ों के बीच वाल्मीकि बने रहते|

मैं अक्सर बाबा को सामान देकर यह कहकर चली आतीबाबाशाम को ले लूँगी। कई बार शाम को नहीं पहुँच पाती। दो चार दिन बाद पहुँचतीतो बड़े ही शिकायती स्वर में बाबा कहतेतुम आई नहीं बिटियामैं तो राह देख रहा था। मैंने उसे दिन रात को 8:00 बजे तक मशीन नहीं बाँधी....मशीन नहीं बढ़ाईक्योंकि मुझे लगा कि तुम आओगी।

मैं माफ़ी मांगते हुए उनसे कहतीबाबा थोड़ा व्यस्त हो गई थी। यह सिलसिला न जाने कितने वर्षों तक चलता रहा और फिर आया वह समय..समय भी क्या कुसमय कहूँ, तो ठीक रहेगा| समय भी ऐसा, थाजिसने देश विदेश के हर बाशिंदे को हिला कर रख दिया..कोरोना का समय। घर से बाहर निकलनाकहीं आना जानासब कुछ रुक सा गयाथम सा गयाअब तो सूरज की रोशनी भी खिड़कियों से झाँक झाँक कर देखा करतेकब दिन हो गयाकब रात आ गईकब रात बीत गई और फिर भोर हो गईये नज़ारे अब गुम हो चुके थेतो सड़कों की तो बात ही क्या की जाए? बहुत दिनों बादशायद डेढ़ साल बादजब जीवन थोड़ा सामान्य हुआहमारा बाज़ार आना जाना शुरू हुआतो मैं फिर से उसी सड़क से गुज़री..लेकिन नजारा कुछ और ही था..तंबू वही टंगा थाकहीं कपड़ों के छोटे मोटे टुकड़े चिथड़े वहीं पड़े थेपर गुम थी उस जर्जर सिलाई की मशीन की घुर्र घूर्र करती वह  आवाज़...गुम थे मशीन के साथ वे बुज़ुर्ग..मेरे बाबा..जिनकी मद्धम आँखों में मैंने सदा जीवन देखा था....गुम थे वे बैगजो उन्होंने ग्राहकों के लिए सिलकर तैयार करके रखे थेगुम थी वह आत्मीयता..वह फिज़ांवे मनुहार भरे शब्द..बिटियातुम आई नहींमैं रात को 8:00 बजे तक राह देखता रहा...मैंने दुकान नहीं बढ़ाई, मैंने मशीन नहीं बांधी।

फिर क्या थाआसपास पूछासब अनजान से चेहरे थे वहाँजिनकी दुकान आसपास थीवे वहाँ नहीं थे...कुछ नए लोग थेजिन्होंने शायद बाबा को कभी देखा भी नहीं था। मुझे बदहवास देख कोई फुसफुसाया..किसी से उड़ते उड़ते सुना था कि वे अब नहीं रहे..वे नहीं रहे!! मैं निःशब्द सी हो गई। एक बार उन्होंने मुझे बताया था कि वे जालंधर के पॉलिटेक्निक के पहले बैच के विद्यार्थी थेउन्होंने वहाँ  सिलाई का काम सीखा था और फिर लगभग 33 वर्ष जालंधर में ही बिजली विभाग में काम किया था। फिर अपने बेटे के साथ सपत्नीक वे मेरे शहर आ गए थेपर मेरे शहर ने उन्हें क्या दियालापता का तमगामैंने सोचा कहाँ ढूँढू उन्हें..! पर कहाँवे तो बहती हवा से गुम हो गए...वे जो बिना कष्ट  श्रम से गगन को सम्हाले हुए थेवे जो सभी प्राणियों को प्रेम आसव पिलाकर जिलाए रहतेवे जो अपनी बाँहें पसारे शीत के कोमल झकोरों से नदी को शीतल कर दिया देतेवे जो अपनी माया के बल पर आकाश नाप लिया करतेजिनकी आँखों में अनगिनत संभावनाओं के दीप जला करतेजिनकी अश्रुपूरित आँखों में ढेर सारी नमी बिखरतीआशीषें देतीं..वे अब कहाँ?

Music

दोस्तों! जीवन किसी के लिए भी आसान नहीं होता। अक्सर दिल और दिमाग के द्वंद्व चलते हैंकहीं नौकरी की समस्याकहीं विवाह की समस्याकहीं विवाह नहीं हो रहा ये दुखकहीं ये कि विवाह क्यों कर लियाकहीं विवाह को बचाया कैसे जाएकहीं नौकरी नहीं मिलतीतो कभी मिल गईतो कैसे बचाई जाएइसका तनावकहीं घरों में जगह नहींतो कहीं दिलों में जगह नहींकहीं घर नहींतो कहीं दिल ही नहीं..हज़ारों दुखलेकिन इन सब के बीच भी जीवन खोजना पड़ता है।

ऐसे में जब दूर दूर तक कोई राह नज़र नहीं आतीकितनी भी कोशिश कर लेंलेकिन कोई हल नहीं निकलताऐसे कठिन समय में परेशान व्यक्ति को केवल दो ही राहें दिखती हैंया तो वो हालातों के सामने आत्मसमर्पण कर दे या परिस्थितियाँ जैसी हैंउसी में चुपचाप खुद को ढाल ले। ऐसी हालत में परिवार के सदस्य भी बात करना बंद कर देते हैंपरिवार की उपेक्षा उसे सबसे ज़्यादा तोड़ती है। व्यक्ति बाहरी दुनिया का सामना तो साहस के साथ कर लेता हैलेकिन घर के भीतर का बेगानापन उसे भीतर ही भीतर तोड़ देता है। ऐसी ही भयावह स्थिति में भी बाबा ज़िंदगी का परचम उठाए रहे क्योंकि वे तो बाबा थेहम सबसे अलग.. हम सबसे इतरहम सबसे जुदाशायद इसी लिए वे भाते थे मुझे। वे जो काम कर रहे थेवो कितना भी बोरिंग क्यों ना होमशीनी क्यों ना होबोझिल क्यों ना होफिर भी वे उसी काम को करते चले गए, करते ही चले गए, धीरे अपने कदम बढ़ाते चले गए, बढ़ाते चले गए| और अंततः उसी काम के बीचउसी सक्रियता के कुछ "मतलब" निकलने लगेजिसके अभी तक कोई मायने नहीं थेउसमें से ही मायने निकलने लगे। उन्होंने खुद को कभी कोल्हू का बैल नहीं मानावे खुद को जानते थे कि वे कोल्हू के बैल नहींरेस के घोड़े हैं। 

वे जानते थे कि जब मानसिक उद्देलन होचिंताओं होंअनिर्णय की स्थिति होंकुछ भी समझ नहीं आ रहा होसारे रास्ते बंद हो गए से लगते होंतब भी यह याद रखना होगा कि कोई न कोई रास्ता अब भी बचा है, रास्ता नहीं तो कोई खिड़की, या फिर कोई रोशनदान, या फिर कोई झिर्री..। पारिवारिक और आर्थिक तंगी और उठापटक के दिनों में भी वे प्रयास करते रहे कि अपने बिखरे टुकड़े समेटेंजैसे वे फटे बैग्स से साथ करतेज़िंदगी के साथ बेहतर तरीके से जूझने की हिम्मत जुटाने लगेएक एक कदम जमा कर रखने लगे। सचमुच मैंने उनसे बहुत कुछ सीखामसलनजो जीर्ण शीर्ण हो चुका हैउसे भूलकर सब कुछ फिर से नए निर्माण में जुट जाइए। दुनिया की इस धूम में आप ही कहीं गुम ना हो जाएँइसका भी ध्यान रखना होगा। आप जो हैंउसे बाहर लाना ही होगा। जब आप खुद को खोज लेते हैं नतो अपने आसपास आपको बहुत से ऐसे लोग नज़र आने लगते हैंजिन्हें आपकी ज़रूरत हैउन्हें ढूँढ कर रोशनी में लाना होगाउन्हें जीना सिखाना होगामुस्कराना सिखाना होगाजैसे उन्होंने अपने शागिर्दों के साथ किया। शायद ऐसा ही सोचकर वे न जाने कहाँ कहाँ के छोटे छोटे बच्चों को अपने से जोड़ते, ‘ला यह बैग दे!’, ‘इस बैग को बराबर वाले घर में दे आ’, ‘ज़रा सुई में धागा डाल दे’ जैसे काम करवाते।

Music

सच कहूँ दोस्तों! वे बहती हवा से थेउनकी मौजूदगी ताज़गी और उत्साह से भरी ऊर्जा और नए सिरे से जीने का जज़्बा जगा देती थीउनकी यादें एक ठंडक सी आह छोड़ गईंएक मीठी खनकलेकिन उसके बाद ख़ामोशी, अनंत खामोशी। उन्हें कोई बंदिश बाँध नहीं पाईसहजता और निर्मलता उनका गुण था। भले ही मेरी उनसे जान पहचान अल्पकालीन ही रहीपर वे अपना गहरा असर छोड़ गए मुझ परचले गए मेरे जीवन पर एक खूबसूरत छाप छोड़कर। जब जब याद आते हैंएक नॉस्टैल्जिक भाव जगने लगता है, जैसे कोई पुरानी याद जो दिल को छूकर चली गई हो, कोई उड़ती से पतंग आँखों के सामने से लहरा कर कहीं छुप गई हो। सोचती हूँउन्हें ढूँढूँपर कहाँ?

और चलते चलते बस यही कहूँगी दोस्तों! ‘बहती हवा सा था वोउड़ती पतंग सा था वो ...कहाँ गया उसे  ढूँढो...

याद रखिएगाजाने वाले कभी लौटकर नहीं आतेपर जीवन चलता रहता हैऔर हम उनकी यादों में ठंडक में सुकून खोजते रह जाते हैंउनकी आवाज़ की मीठी खनक ढूँढते रह जाते हैं। अब आप बताइए दोस्तोंकि आपकी ज़िंदगी में बहती हवा सा कौन हैकैसा है? या फिर कैसा था ? 

music 

अब जब आप उसे ढूंढें,तो अपने प्रेम की इस कहानी कोअपने किस्से को शेयर कीजिए..कीजिइएगा ज़रूर..मैसेज बॉक्स में लिखकर भेजिएभेजिएगा ज़रूरमुझे इंतज़ार रहेगा.....

और..आप भी तो इंतजार करेंगे न ....अगले एपिसोड का...करेंगे न दोस्तों!

सुनते रहिएसुनाते रहिएहो सकता हैयूँ ही बातें करते करते आपकी भी बहती हवा से ‘उस’ से मुलाकात हो जाएहै न संभव दोस्तोंमेरे चैनल को सब्सक्राइब कीजिए...मुझे सुनिए....औरों को सुनाइए..मिलती हूँ आपसे अगले एपिसोड के साथ...

नमस्कार दोस्तों!....वही प्रीत..वही किस्से   कहानियाँ  लिए..आपकी मीत..मैंमीता गुप्ता..

END MUSIC

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