EPISODE 23 दिल चाहता है.. 20/11/26

 

EPISODE 23. 20/11/26

दिल चाहता है..

INTRO MUSIC

नमस्कार दोस्तों! मैं मीता गुप्ताएक आवाज़एक दोस्तकिस्से कहानियाँ सुनाने वाली आपकी मीत। जी हाँआप सुन रहे हैं मेरे पॉडकास्ट, ‘यूँ ही कोई मिल गया’ के दूसरे सीज़न का अगला एपिसोड ...जिसमें हैंनए जज़्बातनए किस्सेऔर वही पुरानी यादें...उसी मखमली आवाज़ के साथ...। जी हाँ दोस्तोंआज हम बात करेंगे दिल कीअरे भई इसके उसके दिल की नहींअपने दिल की। अक्सर होता क्या हैहम इसके उसके दिल की सुनते रहते हैंयह भूल जाते हैंकि एक बेचारा दिल हमारे पास भी तो हैजो चाहता है कि कोई कभी उसकी भी तो सुने। तो चलिएआज जानते हैंकि मेरा दिल क्या चाहता है?

MUSIC   

मेरा दिल चाहता है कि मैं अपने ‘उस’ को देखकर कहूँ कि जब भी मैं तुम्हें देखती हूँतुम्हें बिखरा बिखरा सा पाती हूँलगता है जैसे आसमान में किसी देवदूत के गले से टूट कर गिरी हुई माला के मोती हो तुमजो धरती पर आते आते बिखर गई है। तुम कुछ इस तरह से टूट कर गिरेकि माला का वह धागाउस देवदूत के गले में ही छूट गया और सभी कीमती मोती इधर उधर हो गएजिनसे अलौकिक प्रकाश और खुशबू निकल रही है। मैं उन्हें छूने जाती हूँतो वे जुगनू बन जाते हैं और दर्द के स्याह अंधेरों में लुकाछिपी खेलने लगते हैं। कभी मैंने चाहा कि तुम्हें समेट लूँ अपने दोनों हाथों मेंफिर से एक सुंदर माला बना दूँलेकिन उन्हें समेटना मेरे बस की बात नहीं। छूते ही गायब हो जाते हैं वे मोती। सुनो! ऐसा करो कि तुम खुद को समेट लोहर मोती को सहज लोमैं अपनी साँसों का अनमोल धागा तुम्हें दे रही हूँ। दरअसल जब मैं आई थी ना इस धरती परतब से यह मेरे पास बेकार ही पड़ा है। मेरे पास तो कीमती मोती भी नहींजिन्हें मैं इनमें पिरोकर माला बना सकूँ। अब तुम ऐसा करोइस धागे में अपने सभी मोतियों को आहिस्ता आहिस्ता पिरो दोयहाँ वहाँ बिखरे मोती अच्छे नहीं लगते,

देखो ज़रा आराम से,

धागे में गाँठ न पड़े

सुनो ना.... सुन रहे हो ना तुम!

Music

मेरा दिल चाहता है कि मैं कहूँ कि जो जोड़ता था आकाश को हवाओं सेजो जोड़ता था मन को कल्पनाओं सेजो जोड़ता था पानी को मिट्टी सेजो जोड़ देता था घास को तलहटी सेजो कच्चे रिश्तों को पकाता था वक्त के अलाव मेंजो टूट कर भी नहीं टूटावह सिर्फ़ विश्वास थाजो जोड़ता रहामगर खुद टूटता रहाजो दरारें भरता रहापर खुद भीतर से रिसता रहाजो आज भी आसमान को गिरने नहीं देताजो आज भी धरती को थमने नहीं देताजो आज भी मन के दीए को बुझाने नहीं देतावह विश्वास ही तो है। जो जोड़ता है वह भी विश्वास है और जो टूट रहा हैवह भी विश्वास है। टूटने और जोड़ने के खेल में छुपी है एक आस है। जो जोड़ता है सबकोवह भीतर से यकीनन टूटा होगा ज़रूर। जो साथ है हरदमवह एक दिन यकीनन छूटा होगा ज़रूर। दिल के भीतर देखकर भीतर ही उसका छूट जानाभीतर ही भीतर उसका टूट जानाकोई नहीं देख पाताकोई नहीं सुन पाता कि वह अब भी कहीं ना कहीं कुछ ना कुछ छोड़ रहा होगाखुद के मन की मिट्टी से कोई कोना तोड़ रहा होगाक्या दिल यही चाहता है मेरा?

जब हम रिश्तों के गाँव बसाते हैं नातो एहसास की पतली गलियाँ उनके बीच खुद ब खुद बन जाती हैं। ये गाँव इन्हीं गलियों से साँस लेते हैंगाँव के जीवित रहने में और बस्तियों के तबाह हो जाने में इन पतली संकरी गलियों का बड़ा योगदान होता हैइसलिए शायद गलियों के सिरे खुले छोड़े जाते रहे योग्य इंजीनियरों द्वाराऔर बातों के सिरे खुला छोड़ देते हैं समझदार लोग। वे जुलाहे की तरह गाँठ लगाकर छुपाते नहींवे तो सिरे खुले छोड़ते हैंताकि आने जाने की सुविधा बनी रहेताकि जाने वाले अपने अहमअपने स्वार्थ और अवसरवादिता का सामान लेकर कभी भी उठकर जा सकें और आने वाले कभी भी अपने अहम को भुलाकरअहंकार को गलाकरकिसी भी सिरे से लौट सकें। सच कहूँ दोस्तों! यही तो चाहता है दिल मेरा!

जी हाँ दोस्तों! बहुत ज़रूरी है बातों के सिरे खुला रखना ताकि जीवन बचा रहेसाँसों में घुटन न होताकि समझ आ सकेजिसे सही समझ कर प्यार करते रहेवह कितना सही था और जिसे गलत समझ कर बचते रहेक्या वह सच में गलत थासड़कें खुली रहती हैंतो जीवित रहती हैं और सिरे खुले रहने से जीवित रहते हैं रिश्ते। इतना खुलापन तो ज़रूरी ही है। आज के संदर्भ मेंहम इस स्पेस कह सकते हैं। हर किसी को अपनी अपने स्पेस की तलाश है और स्पेस की ज़रूरत भी है। तो क्यों ना मिलकर एक दूसरे को स्पेस देंसब की निजता का सम्मान करें। है न दोस्तों! भईमेरा दिल तो यही चाहता है।

Music

दोस्तों! दो पहाड़ियों को सिर्फ़ पुल ही नहींखाइयाँ भी जोड़ती हैंनदियों को जोड़ने का काम पुल सदियों से करते आए हैंलेकिन पहाड़ों को जोड़ती खाइयों की ओर किसी का ध्यान ही नहीं गयासोचती हूँ कि इन ऊँचेकठोरबदरंग और रुखेअपने ही अभिमान में अकड़े अकड़े से पहाड़ कभी भी अपनी जगह से नहीं हिलेलेकिन उनके बीच की गहरी खाई उन्हें हमेशा जोड़े रखती हैयह जोड़ बड़ी कोमलता लिए हुए हैंबहुत ही सरलता सेबहुत ही तरलता से जुड़े रहते हैं ये पहाड़। दोनों सिरों से स्थिर रहने के कारण अभिशप्त ज़रूर हैं ये पहाड़ये पर्वत, लेकिन जब जब भी ये दोनों एक दूजे को दूर से देखते होंगेउनकी धुंधलाई सी आँखों से पीड़ा के अनगिनत झरनेअसंख्य तड़पती नदियाँ बहने लगती होगीं और खाई में बिखर जाती होगीं। यह खाई ही उन्हें जोड़ती हैजितनी गहरी खाई उतना गहरा प्रेम! किसने किसने देखा है यह? कौन जाने!                                 

मेरा दिल मानता है कि एक दिन ऐसा भी आएगाजब ये ऊँचे पहाड़ अपने दुख से गल जाएँगेअपनी पीड़ा में बह जाएँगे और उनके अविरल बहते आँसू बीच की गहरी खाई को पाट देंगेपीर पर्वत सी हो जाएगीपहाड़ नदी हो जाएँगेउस दिन दो नदियाँ आपस में मिल जाएँगी और खाई पट जाएगी। इस अनोखा मिलन देखकर धरती गाएगीनाचेगीमुस्काएगीलहराएगी और... और आसमान फिर इतिहास लिखने लगेगाउस दिन दोनों पहाड़ एक दूजे का माथा चूमेंगेउस दिन खाई भी मुस्कराएगी।

दोस्तों! कुछ रिश्ते आसमान में बने होते हैंउनका धरती पर कोई आधार नहीं होताइसलिए कभी समझ ही नहीं आते और ना समझ आती है ऐसी धरतीजहाँ प्रेम लिखा तो खूब गयालेकिन कितना किया गयाकौन जानेअध्याय तो लिखे जाने चाहिए आसमानों मेंप्रेम उन्मुक्त है जहाँसुना हैआसमानों में कोई जेल नहींकोई रस्सी नहींकोई कानून नहींवहाँ ज़रूर प्रेम जीवित रहता होगाजिन्हें धरती ने नहीं संभालाआसमान ने उन्हें थामा है क्योंकि कहते हैं न कि आसमान का दिल बहुत बड़ा हैउसका न कोई ओर हैन कोई छोर।

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सुनोमेरा दिल यह भी जानता है कि सतह पर कभी कोई युद्ध नहीं लड़ा ही नहीं जा सकता। कुशल योद्धा गहरे में उतरकर ही लड़ते हैं। जो सिर्फ़ लहरों की सुंदरता निहारने का शौक रखते थेवे शाम को ही लहरों को निहार कर लौट गएजो जूझने का हुनर रखते थेउन्होंने लहरों के संग खूब कलाबाजियाँ कीं। समंदर सभी को उसकी पसंद के उपहार देता है। किसी को नमककिसी को मोतीकिसी को रेतकिसी को गरलतो किसी को पीयूष। समस्त संसार की मीठी नदियों के दर्द को खुद में समेटे वह किस कदर थमा रहता हैकौन जानेसमंदर बाहर ही नहींहमारी आँखों के अंदर भी हैइस समंदर का कभी कोई किनारा क्यों नहीं मिलताकौन जानेकौन पता देगा कि अगर मैं उसकी आँखों के गहरे समंदर में खो जाऊँतो मुझे किनारा नहीं मिलेगा या नहींऔर अगर मैं खुद दर्द के समंदर में डूब जाऊँतब भी किनारा मिलेगा या नहींकौन जानेकभी कभी मेरा दिल सोचता है कि सारी दुनिया का दर्द खुद में समेट लेने वालासभी को आसरा देने वाला समंदर अहोभाग्य हैपरंतु समंदर को समंदर के भीतर सहारा देने कौन आएगाउसे आसरा देने कौन आएगासमंदर कितना अकेला हैउसमें तो न जाने कितने डूब गएलेकिन वह कहाँ जाए कि खुद को डुबो सकेउसके किनारों पर हज़ारों को मंज़िलें मिलींलेकिन उसे शहर कौन देगाउसे बसर कौन देगाऔर वह तो हमेशा मुसाफ़िर का मुसाफ़िर रह जाएगा और कहता रहेगा  मुसाफ़िर हूँ यारों ना घर है ना ठिकानामुझे चलते जाना हैबस चलते जाना। है न दोस्तों!

Music

मेरा दिल चाहता है कि मैं तुम्हारे बिखरेपन को समेत दूँदेवदूत के गले से टूट कर गिरी हुई माला के मोतियों को अपनी साँसों के अनमोल धागे में पिरोकर एक सुंदर सी माला बना दूँअलौकिक प्रकाश और अप्रतिम खुशबू वाले जुगनुओं से रोशनी चुरा लूँपहाड़ों और खाइयों की दूरियों को पाट दूँसमंदरों को एक शहर दे दूँ और बातों के सिरे खुले छोड़कर रिश्तों के गाँव बसा लूँ।

सच कहूँ दोस्तों! मेरा दिल तो यही चाहता हैऔर आपका?

आपका दिल क्या चाहता हैबताइए तो ज़रा! अपनी चाहतअपनी बातेंअपने किस्से शेयर तो कीजिए..कीजिएगा ज़रूर.. भूलना नहींमैसेज बॉक्स में लिखकर भेजिएभेजिएगा ज़रूरमुझे इंतज़ार रहेगा.....

और..आप भी तो इंतजार करेंगे न ....अगले एपिसोड का...करेंगे न दोस्तों!

सुनते रहिएसुनाते रहिएहो सकता हैक्या पता यूँ ही बातें करते करते एक दिन रिश्तों के गाँव बस जाएँ!

है न दोस्तोंमेरे चैनल को सब्सक्राइब कीजिए...मुझे सुनिए....औरों को सुनाइए....मिलती हूँ आपसे अगले एपिसोड के साथ...

नमस्कार दोस्तों!....वही प्रीत...वही किस्से कहानियाँ  लिए.....आपकी मीत.... मैंमीता गुप्ता...

END MUSIC

 

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