ऑनलाइन खरीददारी पर में आपका स्वागत है

ऑनलाइन खरीददारी पर में  आपका स्वागत है



 

आज के डिजिटल युग में ऑनलाइन शॉपिंग और कूरियर सेवाएँ हर घर की सामान्य ज़रूरत बन चुकी हैं। मोबाइल ऐप और वेबसाइट्स ने बाज़ार हमारे अंगूठे खींच रखे हैं। हर बार हम साइट खोलते हैं, तो एक आत्मीय “मैं आपका स्वागत करता हूँ” वाला संदेश दिखता है, जैसे कोई दोस्त दरवाज़ा खोल कर होस्टिंग करने आया हो। वास्तव में ये आत्मीय शब्द सोशल मार्केटिंग की चाल है| हम बेचे जा रहे सपनों में खुद को विशिष्ट ग्राहक समझ बैठते हैं। स्क्रीन पर नाम या प्रोफ़ाइल देखकर “हैलो, आपका पसंदीदा खरीदारी स्पॉट यहाँ है!” जैसे मैसेज हमें वशीभूत करने की सरल चाल होती है। एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत में 88% लोग ऑनलाइन शॉपिंग के लिए स्मार्टफ़ोन का इस्तेमाल करते हैं, यानी हमारे अंतःवस्त्रों की कीमत से लेकर  हमारे जूते की खरीद तक की पूरी कहानी फ़ोन बताता रहता है। युवा तो फिर भी इसके अभ्यस्त हैं, पर उम्रदराज़ लोगों के लिए तो यह परेशानी का सबब बनता है|

वेबसाइट्स का यह आत्मीय स्वागत सच्ची मुस्कान लगता है, पर असलियत में यह एलगोरिद्म की दयालुता है। डिजिटल मंच हमें मित्रवत भाषा में बुलाकर भरोसा जमा रहे हैं, ताकि हम ज़रूरत से ज़्यादा कार्ट में चीज़ें भर दें। वाकई, जिस कंपनी ने कुछ पल पहले अपशिष्ट मूल्य (reference price) धड़-तोड़ बताई थी, वही अब “आपका पसंदीदा” कहलाकर लॉलीपॉप सौगात देने पर आमादा दिखती है।

अब सोशल मीडिया पर हर कोने में इन्फ्लुएंसर बैठे हैं, जो अपने ‘जादूई रिव्यू’ से हमें खरीददारी की राह दिखाते हैं। इंस्टाग्राम या फेसबुक पर कोई दोस्त जैसा ही दिखने वाला चेहरा कहता है, “ये फेस मास्क लगा लो, मेरी त्वचा खुल कर जीने लगी|” हम बेझिझक अर्डर करते हैं, क्योंकि सोचते हैं, अरे आखिर ये हमारा दोस्त ही तो है। थोड़े से एंगल में एक अखरोट के बॉटल के साथ पोज़ लेकर इन्फ्लुएंसर कहेगा, “भाईसाहब, इस अखरोट का सेवन लाभदायक है, देखो मैं खा रहा हूँ, आप भी खाकर देखिए!”–और हम उसकी बात मानकर तुरंत ऑर्डर कर देते हैं ।

एक और नज़ारा भी प्रायः देखने में आ रहा है| रील पर कुछ सेलिब्रिटी या ट्रैवल ब्लॉगर साधारण टैक्सी की जगह लग्ज़री कार की तस्वीर डाल देता है और कहता है, “अमुक डेस्टिनेशन पर इस ड्रेस के साथ पूरी शाम पर्फेक्ट लगेगी।” देखते-देखते हम उस ड्रेस और कार-रेन्टल दोनों की बुकिंग कर लेते हैं। बेशक, रियल लाइफ में वही कार कभी भी नहीं आई हो, लेकिन हमारी शॉपिंग कार्ट तो सज ही गई! यानी, सोशल प्लेटफॉर्म पर प्रवृत्तियों की लहर होती है, और लोग अपनी ज़िंदगी के हर पहलू को “लाइक-कॉमेंट” की उम्मीद में क्यूरेटरों के हवाले कर देते हैं।

अब ए आई है, तो कस्टमाइज़्ड सुझाव भी हैं| वह हमारी हर हरकत जानता है। सोचिए, आप रात में हवाई अड्डे की कैब बुक करते हैं, तो अगले दिन ही आपके फेसबुक में ‘ट्रैवल एक्सेसरीज़’ की एड दिखने लगती है। आपकी पसंद की क्रीम, खेल-कूद का गियर, यहां तक कि बाथरूम का शैम्पू भी पहले ही पता लगा लिया जाता है। लगता है, जैसे फ़ोन और ऐप्स में कोई व्यक्तिगत रडार लग गया हो।

कुछ साइटें तो चैटबॉट की आड़ में ऐसे सवाल पूछती हैं कि आपको लगे वो आपकी आत्मा में झांक रहे हों| जैसे-“आपको कार्ट में यह आइटम क्यों चाहिए? कोई खास त्यौहार है क्या?” आप जवाब देते हो-“अगर कहना पड़े तो रोज़मर्रा की ज़रूरत…” और चैटबॉट तुरंत कहता है, “वाह! तो हमारी यह किचन मशीन आपके सुबह-शाम को बहुत आसान बना देगी।” असल में हज़ारों टैग और डेटा पॉइंट्स से बनाया यह सिस्टम कहता है, “हमें पता है तुम सच में क्या चाहते हो या क्या नहीं चाहते हो।” आपका फ़ोन कभी-कभी आपकी बातें भी सुन लेता है| एक मिसाल है, “अगर आपके पास हीरे की अंगूठी की एड आ जाए, समझ लेना कि किसी आभासी फ्रेंड ने ‘अश्क भरी कहानी’ की दलील दे दी है!”

बिक्री के झांसे में भी बड़ी चालाकी छिपी होती है। ये हर महीने किसी-न-किसी सेल के साथ आते हैं–“ग्लोबल सेल्फ़ी सेल”, “दिवाली धमाका डिस्काउंट”, “ब्लैक फ्राइडे,  व्हाइट फ्राइडे, प्याज़ी फ्राइडे!” सेलर बार-बार फ़्लैश करके गुहार लगाकर कहता है-“रविवार है आज, ज़िंदगी में खरीददारी का मज़ा है आज, सब पर 50% ऑफ़।” सुनते ही हम ढेर सारा सामान कार्ट में भर लेते हैं। लेकिन क्या सच में 50% बचत हुई? हाल ही संपन्न शोध कहती है कि असलियत में, हमारी जेब से खरीददारी के समय ही पैसा निकलता नहीं, बल्कि वह पहले ही निकल चुका होता है, जब हमें “डिस्काउंट” मिलता है, जिसे पाकर हमारे अहम की गिल्टी कुछ और बड़ी हो जाती है। पर हम यह भूल जाते हैं कि यह एक जकड़न है, फिर जकड़न मोटे रस्से की हो या रेशमी धागे की, रहेगी तो वह जकड़न ही|

और डिस्काउंट स्कीम्स भी किसी से कम नहीं होतीं–“एक खरीदो, दूजा मुफ्त” की चाल में पहले दो सामान यानी वस्तुओं की कीमत जोड़ दी जाती है। “न्यूनतम खरीद पर कूपन” के  प्रलोभन में ऊँची मूल कीमत खींच ली जाती है। महंगाई कम है, तो सेल चलना चाहिए! हमें रंग-बिरंगे बैनरों ने इतनी अच्छी ख़ासी सुर्खियाँ दी हैं कि हमारी आँखें चकाचौंध में डूब जाती हैं और दिमाग़ बीयर की तरह फ्रिज में ठंडा हो जाता है। आखिर में बस एक ही सवाल रह जाता है-“असली रियायत मिली या फिर हमारी मूर्खता पर छूट मिली?”

चलिए, अब रिटर्न पॉलिसी की बात कर लेते हैं| कहा जाता है–“रिटर्न पॉलिसी बिलकुल आसान”| लेकिन इसके लिए भी जद्दोजहद करनी पड़ती है। कॉल सेंटर से बात कीजिए, तो पहले तो ऑटोमेटेड वॉइस बोलेगा-“धन्यवाद”, फिर अंतहीन म्यूज़िक बजते हुए कंमयूट कराता रहेगा। अनेक बार धुन के बाद कोई असली इंसान आवाज़ में आएगा-साहब, हम आपकी तकलीफ़ समझते हैं…आदि.. आदि| और कभी-कभी घंटों तक उस अनचाहे म्यूजिक को सुनने के बाद जवाब आता है-कभी हमारे सभी कर्मचारी व्यस्त हैं| असुविधा के लिए खेद है| इनका यह खेद क्या ग्राहक की परेशानी को कम कर सकता है?

फिर ईमेल में “दिए गए पते पर भेजें” कहकर आपने दो रोटियाँ खरीदने के लिए डेढ़ रोटियाँ खर्चकर दीं| “प्राइम मेंबर” बनने पर भी हेल्पलाइन कोई समाधान नहीं देती, जबकि आप तो पैसे देकर प्राइम मेंबर बने थे, ऐसे में भी धोखा! प्रोडक्ट रिटर्न करने का फार्म हो या व्हाट्सएप चैट बॉक्स, कोई उपाय नहीं मिलता– खैर, चलते हैं, वेबसाइट पर, जहाँ लिखा है-“सहयोग के लिए यहां क्लिक करें”, पर वह पेज तो खुलता ही नहीं, नाना प्रकार एररर्स जो मौजूद हैं उसके पास| इस तरह असलियत में कस्टमर सपोर्ट भी अक्सर “हम हैं ना!” कहने के बहाने आपकी समय-सीमा में भूले से भी मिलने नहीं आता।

असल में यह सारा खेल उपभोक्ता के मनोविज्ञान का है, जहाँ आवश्यकता नहीं, उसका लालच काम करता है| आदमी की ज़िंदगी हो या शॉपिंग कार्ट? दोनों के सामान में फ़र्क ही क्या है? अगर फ़्रिज लेने की ज़रूरत न हो, तो भी “फ्रिज़ाया हुआ  इंसान” किसी नए फ़्रिज को जाँचने को आतुर हो जाता है और हम कहने लगते हैं-‘ज़रूरत है’| एक रिपोर्ट में भी बताया गया है कि ऑनलाइन खरीदते वक्त 99% ग्राहक रिव्यू देखते हैं, और 96% लोग बुरा रिव्यू ढूंढने की गहराई तक जाते हैं। यानी जिस टेक्नॉलजी से बचत होनी चाहिए थी, हम वही रिव्यू देखकर मन लगा बैठते हैं कि ‘एक और ले लिया जाए।’

मानसिक स्विच बटन पर एक तरफ़ हमारी ठोस ‘ज़रूरत’ टिकी होती है, पर सबसे बड़ी दुकान की उपज की गई ‘लालच’ होती है। हर “दर्ज़न” फ्लिपकार्ट प्वाइंट वाली घड़ी, हर “50% ऑफ” वाली सौगात, हमारे दिमाग़ को ये संदेश देती है- “तुम्हारी इच्छा अभी पूरी नहीं हुई! तुम्हें और-और-और चाहिए!” हम छूट के जादू में अपने विवेक को भूल जाते हैं और जहां “ज़रूरत” होती दिखती है, वहाँ बेचैन हो जाते हैं। इस तरह डिजिटल मॉल हमें न तो सुकून देता है, न संतोष – बस बहकाता रहता है।

इसीलिए, जब अगली बार आपकी स्क्रीन पर “आपका स्वागत है!” झिलमिलाएगा, तो एक बार सोचना कि क्या वो सचमुच आपको अपनापन दे रहा है या फिर वह विपणन की विद्रूप मुस्कान है। सच तो यह है कि हर बार हम अपने हालात बतौर ग्राहक “स्वागत” में खुश होते हैं, असल में ऑनलाइन दुनिया हमारी जेब से रह-रह कर चंद सिक्के ले रही होती है। इन्फ्लुएंसर हँस-हँसकर हमें ट्रेंडी आइटम देने का वादा करते हैं, “सेल” एक फिसलन है और एआई हमारे दिल के हर सुनसान कोने से हमारी आवाज़ उठाता है। लेकिन अंत में सवाल यही रह जाता है कि क्या वास्तव में हम बाज़ार को कंट्रोल कर रहे हैं, या बाज़ार ने हमें अपने हाथ में ले लिया है? इसलिए,  इस मोड की खरीददारी की दुनिया में कदम रखते ही याद रखिए–हो सकता है स्वागत हमारा हो रहा हो, लेकिन जीत बाज़ार की हो रही हो।

 

डॉ मीता गुप्ता 

विचारक 

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