माँ की साड़ी
माँ की साड़ी
बक्से में सोई है, मलमल की ओट में,
इत्र की खुशबू, तहों में है चोट।
ओ माँ की साड़ी, ओ माँ की साड़ी,
तेरी हर लहर में बसी माँ की झांकी।
तकिए के नीचे है इस्त्री का जहाँ,
कपूर और धूप से महका गगन।
ओ माँ की साड़ी, ओ माँ की साड़ी,
तेरी हर तह में है पूजा की बाड़ी।
चूड़ियों की झंकार, कसकर खोंसा पल्लू,
काम की उमंग है, मन का उल्लास।
रेखाएँ पल्लू पर जैसे सत्य के पुल,
दुष्ट को हराने का माँ का विश्वास।
ओ माँ की साड़ी, ओ माँ की साड़ी,
तेरे रंगों में रानी की आभा प्यारी।
गांठों में छिपे हैं रहस्य अनगिन,
खजाने से भरे हैं हर मोड़ के बिन।
पीली मधुरा, हरी कगार,
माँ के संग खिलता है प्यार।
ओ माँ की साड़ी, ओ माँ की साड़ी,
लपेटूँ तो बढ़ती ही जाती अटारी।
कभी मैं नन्हीं, तुझको नापा,
ओढ़ा, तो पाया तू अंतहीन छापा।
आम, काजू, गेहूँ के दाने,
नववर्ष के सपने पुराने।
ओ माँ की साड़ी, ओ माँ की साड़ी,
तेरी गंध में बसी है ऋतुओं की क्यारी।
तारों से जगमग तेरा रूप,
बारिश-धूप में तू माँ का स्वरूप।
अंधेरे में भी तू चमक दिखाती,
दुख में आकर मुझे सहलाती।
ओ माँ की साड़ी, ओ माँ की साड़ी,
तेरे आँचल में है जीवन की थाली।
रेशम का सपना पूरा हुआ,
पर पिता का चेहरा धुंधला हुआ।
अब पहनती माँ, पर सपना खोया,
आँखों में रह-रह के आँसू रोया।
ओ माँ की साड़ी, ओ माँ की साड़ी,
तेरे संग जुड़ी है माँ की कहानी सारी।
उडुपी बुनकरों की पुरानी डोरी,
दीवार से झाँकती वही कहानी।
खोलूँ तो ओढ़ लूँ माँ का प्यार,
"अम्मा" कहूँ, तो
गूँजें संसार।
ओ माँ की साड़ी, ओ माँ की साड़ी,
तेरा नाम ही है अमर पुकार भारी।


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