EPISODE-16 लब हिलें तो.. 14/08/26
EPISODE 16
लब हिलें तो.. 14/08/26
INTRO MUSIC
नमस्कार दोस्तों! मैं मीता गुप्ता, एक आवाज़, एक दोस्त, किस्से कहानियाँ सुनाने वाली आपकी मीत। जी हाँ, आप सुन रहे हैं मेरे पॉडकास्ट, ‘यूँ ही कोई मिल गया’ के दूसरे सीज़न का अगला एपिसोड ... जिसमें हैं, नए जज़्बात, नए किस्से, और वही
पुरानी यादें...उसी मखमली आवाज़ के साथ...। जी हाँ दोस्तों, आज हम
बात करेंगे, प्रेम की, प्रिय की मुस्कान की, उस मुस्कान के कारण हमारे आस
पास बनी खूबसूरत दुनिया की, क्योंकि
जब उसके लब हिलते हैं, तब
मोगरे के फूल झड़ते हैं, और
सारा वातावरण मोगरे की खुशबू से खुशनुमा हो जाता है।
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दोस्तो! यह सच है कि किसी प्रिय की
बातें, उनकी मुस्कान और उनकी भावनाएँ हमारे
आस पास एक खूबसूरत दुनिया की सृष्टि करती
हैं। यह एक तरह का इज़हार है कि उसके बिना सब कुछ अधूरा है और उसके होने से ही
जीवन में रंग और खुशियाँ हैं क्योंकि जब जब
उसके लब हिलते हैं, तो फूल
खिलते हैं, अमावस्या में भी चाँद निकल आता है, उसकी हँसी में सवेरा हो जाता है, उसकी आँखों में ही सारा जहाँ डूब जाता है, उसकी मुस्कान से बहारें मिल जाती हैं, उसके हर लफ्ज़ में मिठास है, उसके हर ख्याल में उजास है, उसकी ख़ुशबू से सारी महफिल महक जाती है, उसकी खिलखिलाहट सारे माहौल में मिठास और खुशबू भर
देती है और उसके आने पर सारा जहाँ सुगंधित और खूबसूरत हो जाता है और दिल गया उठता
है लब हिलें
तो मोगरे के फूल खिलते हैं कहीं..
पिछले दिनों किसी काम से एक ऑफिस में जाना हुआ। जिनसे मिलना
था, वे एक महिला अधिकारी थीं। जैसे ही
मेरी बारी आई, मैं उनसे मिलने गई, देखा, वो तो मेंरे कॉलेज की सहेली निकली। मिलते ही हम दोनों ज़ोर ज़ोर से हँसने लगीं। आवाज़ सुनकर कमरों में से
कर्मचारी निकल कर आए। लगा कि कुछ गलत हो गया। मेरी सहेली एकदम से चुप हो गई मानो कोई अपराध करते
पकड़ी गई हो। बोली, सब सुन
रहे हैं, देखो, कमरों से बाहर आ गए, इतने
सालों की नौकरी में मेरी आवाज़ आज तक किसी ने नहीं सुनी थी। मैं हँस कर बोली,
“क्या कब्र बना रखा है ऑफिस को? आज सभी मुर्दे कब्रों से बाहर निकल आए।” इस बात
पे पूरा ऑफिस ठहाका मारकर हँस पड़ा।
मेरी दोस्त की आँखों में आँसू आ गए।
वह बोली, “अपनी ही खनकती हँसी बहुत दिनों बाद सुन रही हूँ मैं। एक हँसी जिसमें
रहती थी खनखनाहट, वो सिर्फ़ हँसी नहीं थी, वह एहसास थी, खनक थी, कई
दिनों से कहीं गुम और चुप सी थी वो, दबी हुई थी वो खनक न जाने किन दिशाओं में, आज तुम्हारे आने से मुस्कराहटों के साथ उभरी है
फिर उन लबों पे।“ वह आगे बोली, “माँ के
यहाँ जो हँसी छूट गई थी, वो
बरसों बाद आज लौट आई है। इससे पहले कब खुलकर हँसी थी, याद ही नहीं।“ वे तो बोले ही जा रही थी, और मैं यह सुनकर अवाक।
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चलिए दोस्तों, एक और वाकया लेते हैं........एक विवाह समारोह में
जाना हुआ, वहाँ पुरुष और महिलाएँ सभी साथ साथ बैठे थे। सभी पुरुष समूह बना कर खूब हँसी मज़ाक कर रहे थे, लेकिन महिलाएँ चुपचाप बैठी थीं। मुझे तो यह कुछ अटपटा सा लगा| इतने में एक महिला ने आकर चुप्पी तोड़ी, तो सभी महिलाओं ने उसे आँखें दिखा कर चुप करवा दिया, मानो वो किसी मर्यादा को तोड़ रही हो और फिर सब
शांत हो गया। किसी भी बात का, मज़ाक
का कोई रिएक्शन ही नहीं। अक्सर महिलाएँ बातें तो खूब करती हैं, लेकिन उनमें हास्यबोध नहीं दिखता।
मिसेस शर्मा बहुत स्वादिष्ट खाना
बनाती हैं। उस दिन उनके पति ने कहा, “आजकल
तुम्हारे हाथों में वो स्वाद नहीं रहा, जो पहले था। वो झट से बोलीं आप भी तो अब पहले जैसे नहीं रहे...। दोनों इस
बात पे हँस पड़े... मिसेस शर्मा बहुत बड़ा झगड़ा कर सकती थीं, लेकिन उनके हास्य बोध ने बचा लिया।
यह उदहारण है ऐसी महिलाओं का, जो अपनी ज़िंदगी में यहाँ वहाँ
बिखरे हास्य को समेट लेती हैं। जो हँसना जानती हैं, दूसरों को हँसाना भी जानती हैं, उनमें एक कॉमन सेन्स होता है। लेकिन अफ़सोस ये कि कितनी महिलाएँ हैं
इन जैसी? जो ठहाके लगाती हैं, खिलखिलाकर हँसती हैं, दिल खोल कर मुस्काती हैं और किसी उदास चेहरे पर प्यारी सी मुस्कान सजा देती हैं।
अक्सर औरतों का हँसी, ठिठोली, ठहाकों से कोसों दूर का नाता होता है। ये स्थिति सभी जगह दिखती है, जैसे जब वे पार्टी में होती हैं, या पिकनिक में, दोस्तों की महफ़िल में, आफ़िस
में या घर में। वो सभी जगह अपने होंठों
पे चुप का ताला लगाए रहती हैं, बातें
चाहे कितनी भी कर लें, लेकिन
हँसते हुए कम ही दिखती हैं। बहुत ज़्यादा हुआ, तो धीरे से मुस्करा देंगी, लेकिन वो भी प्लास्टिक वाली मुस्कान। वो खुद हँसना हँसाना नहीं चाहती इसलिए दूसरों के हास्य बोध को भी कम ही समझ पाती हैं। कभी कभी तो उन्हें समझ ही नहीं आता कि सब किस बात
पे हँस रहे हैं।
किसी महिला से पूछो कि आखिरी बार वो
कब खिलखिलाकर हँसी थी, तो उसे
जवाब देने में वक्त लगेगा और सोचने में भी। क्या वजह है कि महिलाएँ पुरुषों की तरह
हँसती नहीं और न ही वो मज़ाक करती हैं।
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दरअसल दोस्तों! बचपन की हिदायतें
पचपन तक पीछा करती हैं, बचपन
से ही घुट्टी में घोल के पिलाया जाता है कि लड़कियों को धीरे धीरे बात करनी चाहिए, मीठा बोलना चाहिए, कम बोलो, हँसो
मत ज़ोर से, रास्तों पे या बाज़ार में, पब्लिक में तो बिल्कुल नहीं हँसना। मायके में हो, तो पिता और भाई के सामने मत हँसो, और ससुराल में हो तो सास ससुर और जेठ के सामने चुप रहो, ऑफ़िस में हो तो बॉस के सामने चुप रहना... उफ़!
फिर महिलाएँ हँसें तो हँसें कब ?
कब्र में जाने के बाद?
शायद वहाँ भी बंधन हों.....!!
हमारे समाज ने बचपन से ही लड़कों और
लड़कियों के बीच अलग अलग मापदंड तय किए
हैं। एक लड़की से हमेशा एक निश्चित व्यवहार की अपेक्षा की जाती है। उसे कभी किसी
के साथ कोई मज़ाक मस्ती नहीं करनी है, हँसना हँसाना
नहीं है क्योकिं सभ्य, शरीफ़, भद्र और सुशील संस्कारवान लड़कियों को यह सब शोभा
नहीं देता। और इस तरह हमारे समाज ने सुंदर होठों से सुंदर मुस्कान छीन
ली....खिलखिलाहट पर बंदिशें लगा दीं, पहरे
लगा दिए।
और उन आज्ञाकारी लड़कियों ने चुपचाप
शराफ़त का लबादा ओढ़ कर अपनी हँसी और अनगिनत मुस्कानों की हत्या कर दी। इसी तरह
बरसों बरस से होठों के किनारों तले कई
मुस्कानें दम तोड़ती आई हैं। फिर धीरे धीरे
महिलाओं ने इसे अपने स्वभाव में शामिल कर लिया। एक तो वे वैसे ही संवेदनशील स्वभाव
वाली होती हैं, अक्सर उन्हें रोने धोने, सिसकने वाली ही समझा जाता है, ज़रा ज़रा सी बात पे रो देना, मायके में भाइयों ने मज़ाक किया तो रो दिए, ससुराल में ननद
देवर ने छेड़ दिया, तो रो
पड़े। किसी ने मोटी कह दिया या किसी ने नाटी कह दिया, तो आँसू छलक आए। ऐसे अनगिनत उदाहरण हम रोज़ अपने आसपास देखते हैं। वे
किसी मज़ाक को सहजता से नहीं ले पातीं। महिलाएँ भावुक होती हैं, किसी भी मज़ाक को सहजता से नहीं ले पातीं और खुद
पर हँसना तो उन्हें आता ही नहीं। वैसे भी खुद पर हँसने का हौसला हर किसी में होता
भी नहीं, अक्सर पुरुष यही सोचते हैं कि भई
महिलाओं से संभल कर बात करनी चाहिए, न जाने
किस बात का बुरा मान जाएँ या रो पड़ें।
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दोस्तों! क्या कभी आपने ऐसी किसी
महिला को देखा है, जो ज़ोर ज़ोर से हँस रही हो और आपने उसे जज न किया हो, न ही उसने ध्यान दिया हो कि हँसते हँसते वो कैसी दिख रही है? उसकी आँखें छोटी और दांत बाहर दिख रहे हैं? शायद ही देखा हो....महिलाएँ हमेशा अपने लुक्स को
ले के सचेत रहती हैं। वो हँसते हुए भी खूबसूरत दिखना चाहती हैं। कहीं चेहरा बिगड़
न जाए, दाँत न दिखें, आँखें सिकुड़ न जाए आदि.. आदि ..इतनी तैयारियों
के बाद कोई क्या ख़ाक हँसेगा? ..वो तो
सिर्फ़ प्लास्टिक की हँसी हँसेगा, और फिर
लोग तो बैठे ही हैं, उन्हें
जज करने के लिए.... है न दोस्तों!
अगर लोग किसी ज़िंदादिल महिला को
हँसते हुए देखते हैं, तो
अजीब सी शक्ल बनाते हैं, उसे घूर घूर के देखते हैं, मानो वो कोई गुनाह कर रही हो। उसे ज़ोर ज़ोर से हँसते देख उसे असभ्य मान लिया जाता है, यही वजह है कि महिलाओं की मुस्कराहटें कहीं गुम
हो गई हैं। सर्वेक्षणों के अनुसार पुरुषों और महिलाओं के हास्यबोध में काफ़ी अंतर
होता है। महिलाओं के मुकाबले पुरुष ज्यादा हास्य उत्पन्न करने में सक्षम होते हैं।
यही वजह है कि हास्य कवि सम्मलेन हो या हास्य के कार्यक्रम महिलाएँ इनमें कम ही
नज़र आती हैं।
तो क्या हम ये मान लें कि महिलाएँ
नीरस होती हैं, बोरिंग और बुद्धू टाइप की होती हैं।
जी नहीं, कतई नहीं, महिलाओं में भी हास्य की उतनी ही समझ होती है, जितनी पुरुषों में और हर महिला अपनी ज़िंदगी के
साथी के रूप में ऐसे ही पुरुष की कल्पना करती है, जो हँसमुख हो, खुश
दिल हो, वे भी रोते से, चुप्पे से साथी को कोई पसंद
नहीं करती, फिर भी वो खुद गुमसुम रहती हैं, क्यों? मज़ाक नहीं करती, क्यों? ज़िंदगी को ज़िंदादिली से नहीं जीतीं, आखिर क्यों?
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दोस्तों! याद रखिएगा, घर की महिला यदि चुप या उदास रहेगी, तो उनके बच्चे भी कभी नहीं हँसेंगे। जिस घर में
महिलाएँ मुस्काती नहीं, हँसती
नहीं, उस घर में ख़ामोशी के साये अपना डेरा
जमा लेते हैं।
हमारी ज़िंदगी में चाहे जितनी भी
परेशानियाँ हों, दुःख
हों, पीड़ा हो, हँसी और मुस्कान फिर भी बोई जा सकती है, उगाई जा सकती है, इसमें कोई खर्चा नहीं होता, न कोई खाद
पानी देना होता है। हँसी तो एक प्रार्थना है, जिसे आलाप से लेकर स्थाई तक पहुँचने के लिए
दोहराव की ज़रूरत नहीं होती, उसे तो
सिर्फ़ सम्मिलित स्वरों की, सहयोग
की ज़रूरत होती है और कोई उसे जज न करे, इसकी ज़रूरत होती है।
दोस्तों! हँसी से बड़ी कोई नेमत नहीं, वरदान नहीं, इस पर तो कोई टैक्स भी नहीं, जो लोग नहीं हँसते, वो कभी
ज़िंदगी का लुत्फ़ नहीं उठा पाते। हँसना हँसाना कोई बुरी बात नहीं है ये तो एक
उन्मुक्त बहता झरना है, इसे
रोकना नहीं, टोकना
नहीं, बहते देना है। महिलाएं सुन रही है न, आप हँसेगी, तो दुनिया हँसेगी, आप
मुस्काएँगी तो सारी दुनिया मुस्काएगी। हँसी से बैर नहीं, दोस्ती कीजिए। यदि आप ऐसा करेंगी, तो सोसायटियों में चल रहे ‘लाफ़्टर क्लब’ बंद हो
जाएँगे, और ये लाफ्टर क्लब आपके ही भीतर समा
जाएंगे, क्यों, क्या विचार है, दोस्तों!
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जी हाँ दोस्तों! हँसी से बढ़कर
खूबसूरत कुछ नहीं, इसका आनंद उठाइए, स्वयं भी हँसें और.. औरों को भी हँसाएं, क्योंकि इससे बड़ी कोई नेमत नहीं, वरदान नहीं, यह ईश्वर का आशीर्वाद है हम मनुष्यों के लिए, जानवर हँसते नहीं हैं, केवल हम हँस सकते हैं, तो क्यों न हँसें? हमारी बातें तो चलती ही रहेंगी, इसीलिए कहती हूँ कि अब आप बताइए कि आप की ज़िंदगी में हँसने के क्या
मायने हैं? और महिलाएं सुनें, बेधड़क, बेखौफ़ होकर मुस्कराएं, यदि
लोग जज करते भी हैं, तो
करते रहें, क्योंकि कुछ तो लोग कहेंगे, लोगों का काम है कहना! अपनी कहानी, अपने किस्सेमें भी शेयर कीजिए .. कीजिइएगा
ज़रूर..। मैसेज बॉक्स में लिखकर भेजिए, भेजिएगा ज़रूर, मुझे
इंतज़ार रहेगा.....
और..आप भी तो इंतजार करेंगे न
....अगले एपिसोड का...करेंगे न दोस्तों!
सुनते रहिए, सुनाते रहिए, हो सकता है, यूँ ही
बातें करते करते आप मुस्कराने लगें, खिलखिलाने लगे, और जी खोल कर हँसने लगें!.. है न दोस्तों? इसीलिए मेरे चैनल को सब्सक्राइब कीजिए...मुझे सुनिए....औरों को
सुनाइए....मिलती हूँ आपसे अगले एपिसोड के साथ...
नमस्कार दोस्तों!....वही प्रीत...वही
किस्से कहानियाँ लिए.....आपकी मीत.... मैं, मीता गुप्ता...
END MUSIC
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