EPISODE-19 ये कौन चित्रकार है? 25/09/26

 

EPISODE   19      

ये कौन चित्रकार है?    25/09/26

INTRO MUSIC

नमस्कार दोस्तों! मैं मीता गुप्ताएक आवाज़एक दोस्तकिस्से    कहानियाँ सुनाने वाली आपकी मीत। जी हाँआप सुन रहे हैं मेरे पॉडकास्ट, ‘यूँ ही कोई मिल गया’ के दूसरे सीज़न का अगला एपिसोड ... जिसमें हैंनए जज़्बातनए किस्सेऔर वही पुरानी यादें...उसी मखमली आवाज़ के साथ...। जी हाँ दोस्तोंआज हम बात करेंगे प्रकृति की खूबसूरती कीसुंदरता की..यानी पेड़ों की फुनगी कीपत्तों पर बिछी ओस की बूँदों कीफूलों की खुशबू कीनिर्बाध झरनों के तेज़ वेग से गिरते जल कीनदियों के सर्पाकार मोड़ों की.. और उनके संग   संग ही तलाशते हैं अपनी ज़िंदगी का अर्थ की! कुदरत, प्रकृति, महज हमारे जन्म और जीने के लिए ही ज़रूरी नहीं हैसोचिएयदि हमारे आसपास प्रकृति के प्राणतत्व की उपस्थिति न हो। सोचकर देखिएगा कि आप किसी ऐसी जगह मौजूद हैंजहाँ सबकुछ अदृश्य हैआपके पैरों तले मिट्टी नहींआँख के सामने धरती नहींपीने के लिए पानी नहीं और न बातें करने के लिए परिंदे?..ऐसी ज़िंदगीक्या ज़िंदगी होगीऐसे में हम यह सोचने पर मजबूर जाते हैं कि आखिर यह चित्रकार है कौन, जिसने यह नियामत हम पर बरसाई है?

क्या कहते हैं दोस्तों!

MUSIC  

दोस्तों! आज की बात की शुरुआत उस महान शख्सियत को याद करते हुए....जो भारत के कण   कण मेंयहाँ की मिट्टी की सोंधी खुशबू मेंयहाँ की ठंडी बयार मेंफ़िज़ाओं मेंपत्ती   पत्ती मेंडाली   डाली मेंकण   कण में बसा है....आप समझ गए न...जी हाँ! मैं बात कर रही हूँबापू की....उन दिनों बापू पद यात्रा पर थे। वे अपने सामान में नहाने के लिए एक पत्थर रखा करते थे। एक दिन मनु बहन उनका वह पत्थर पिछले पड़ाव पर ही भूल गईं। जब बापू को इसका पता चला तो उन्होंने उन्हें वह पत्थर लाने को कहा।

यह सुनकर मनु कहने लगीं   बापू! यहीं आसपास कितने पत्थर पड़े हैंइन्हीं में से एक उठा लेती हूँ। वहाँ जाने   आने में तो पूरे तीन घंटे लग जाएँगे। इस पर बापू ने कहा   मनुतुम वही पत्थर लेकर आओ। यहाँ इतने पत्थर पड़े हैंतो क्या हुआये किसी      किसी काम तो आएँगे हीअभी नहींतो पांच बरस बाद। हमें इस तरह अन्य पत्थरों को बिगाड़ने का कोई हक नहीं।

मनु तीन घंटे में वह पत्थर लेकर लौटीं। बापू ने खुश होते हुए उसे लेकर अपने थैले में रख लिया और बोले,  यों तो प्रकृति की गोद में असंख्य पत्थर बिखरे पड़े हैंलेकिन हमें अपनी आवश्यकता के अनुसार ही उनका उपयोग करना चाहिए।

इस प्रसंग के बारे में विचार करने लगी, तो समझ आया कि हम ज़िंदगी भर जिन मूल्यों को तलाशते रहते हैंपरखते रहते हैंउनका अर्थ खोजने की जद्दोजहद में जुटे रहते हैंबापू ने उसे कितनी सहजता से कह दिया....कि प्रकृति से हमें अपनी आवश्यकताअपनी ज़रूरत के अनुसार ही लेना चाहिए...उससे अधिक नहीं...और उसका दोहन तो कतई नहीं। क्या एक बात आपने कभी गौर की है कि ज़िंदगी को परखने की कोशिश में हम एक महत्वपूर्ण बात भूल जाते हैं कि ज़िंदगी की विशिष्ट परिभाषाएँ दरअसलहमारे सामान्य होने में ही छुपी हैं। इनमें से ही एक अहम बात है   प्रकृति से, कुदरत से हमारा जुड़ाव। कुदरत का मतलब मिट्टीपानीपहाड़झरने ही हैं ही, हमारी देह मेंहमारे दुनियावी वजूद में शामिल पंच तत्व भी तो प्रकृति से ही मिले हैंहै न दोस्तों! और फिरदुनिया में अगर हम मौजूद हैंतो प्रकृति की नियामतों के बिना नहीं। क्या हम साँस ले पाएँगेक्या रंग बिरंगे के फूलों की खुशबुओं से मुलाकात कर पाएँगेभोजन और पानी के बगैर कैसे गुज़रेगी यह ज़िंदगी की गाड़ी? यही तो वह चित्रकार पूछता है हमसे..!

Music

खैरअपने अस्तित्व से आगे निकलकर इसके अर्थ को विराट संदर्भो में तलाशेंतो हम पाएँगे कि जन्म से लेकर ज़िंदगी और फिर नश्वर संसार से अलविदा कहने तक प्रकृति हमारे साथ अलग   अलग रूपों में अपनी पूर्ण सकारात्मकता के साथ मौजूद रहती है। पहाड़ की छाती चीरकर  झरने पानी लेकर हाज़िर हैंउनकी इस सौगात को आगे बढ़ाती हैं नदियाँ...जो फिर सागर में मिल जाती हैं। समंदरों से यही पानी सूरज तक पहुँचता हैऔर फिर होती है बारिश। बारिश न होतो खेत कैसे लहलहाएँगेखुशबुएँ न होंरास्ते न होंजंगलों का नामोनिशां न होतो हमारे होने काइस ज़िंदगी का क्या ही मतलब रह जाएगाप्रकृति की हर धड़कन में कुदरत के रचयिता के श्रृंगारिक मन की खूबसूरत अभिव्यक्ति होती है। किस्म किस्म के उत्सव हैं ये भी..!

दोस्तों! मौसमों की रंगत भी कुछ कम अनूठी नहीं। जाड़े की ठिठुरन मेंबारिश में भीगने की उमंग में और गर्मी में छाँव में अनिर्वचनीय सुख है। सब के सब मौसम कुछ न कुछ बयाँ करते हैं। सच कहूँतो प्रकृति में एक अनूठे ज्ञान की पाठशाला समाई हुई है। ज़रूरत बस इस बात की है कि हम कुदरत की स्वाभाविक उड़ान कोउसके योगदान को समझेंसराहें और पहचानेंतभी हर दिन बिना कोई विलंब किए उगने वाले सूरज कोबगैर थके उसकी परिक्रमा करने वाली पृथ्वी को और उनके पारस्परिक संबंध के कारण होने वाले बदलावों को समझ पाएँगे। हम जान पाएँगे कि वृक्ष बिना कुछ लिए हमें फल और छाया देते हैं। नदियाँ कुछ भी नहीं कहतींपर पानी की सौगात देती हैं। मौसम अपने रंग बिना किसी कीमत के बिखेरते हैं। हम जब प्रकृति की ओर से मिल रही सीख समझते हैं और उसे आहत नहीं करतेउसकी तरफ से आनंद की वर्षा होती हैहम उसमें भीगते रहते हैंलेकिन जब   जब हम कारसाज़ कुदरत को आदर करना बंद कर देते हैंतब तब हमें कई तरह के विध्वंसों का, सुनामियों का सामना करना पड़ता है।

Music

सोचती हूँ दोस्तों! किस   किस को निहारूंकिस   किस की कहानी सुनाऊँमेरी ज़िंदगी में इस चित्रकार ने किस   किस तरह से ‘अहा मोमेंट’ दिए हैंये विशालकाय वृक्षफलों से लदी उनकी शाखाएँवृक्ष जो राहगीरों को आश्रय देते हैंहवाएँ  जो शीतल शांत हैसमुद्र  जिसमें अद्भुत प्रवाह है, पर जो बहता अपनी ही राह हैमानो जलमाला का महाकुंभ हैकितना विचित्र, अद्भुत, मनोहर दृश्य हैपर्वत...पर्वत तो अमर अटल हैधराशील गगनचुंबीय हैंकहता है झुके ना शीश मेराचक्रव्यूह   सा वह अभेद्य है। सच कहूँ दोस्तों! प्रकृति एक संपदा हैरंगों से भरी फुहार हैऔर इसे रचने वाला वो चित्रकार है। वो कौनआप समझ ही गए होंगेवो, जिसके कारण अजर   अमर यह वसुंधरा हैबस इतनी   सी इसकी कहानी हैक्या सचमुच इसकी इतनी   सी ही कहानी हैयह तो अमूल्य   अनुपम   अतुलनीय हैंजन   जन का विश्वास है और  युगों   युगों की अमर कहानी है और यह कहानी उसे चित्रकार ने तो लिखी है!

मुझे याद आता है अपना बचपन... जब हम नानी के पास सर्दियों में जातेरात के समयसब कामों से फ़ारिग हो होकरवे सब बच्चों को रज़ाई में अपने पास लिटा लेतीं। हम सब बच्चे दिन भर रात हो होने वाली इस अनोखी पाठशाला की धमाचौकड़ी का इंतज़ार करते। सारे बच्चे नानी के सुरीले गले के साथ अपने बेसुरे गले मिलाते और कभी गाते    ‘छोटी   छोटी गइया छोटे   छोटे ग्वालछोटौ सो मेरौ मदन गोपाल।’ कभी   ‘जमुना किनारे मेरौ गाँवबंसी बजा के आ जइयो’ और  कभी   ‘ससुराल गेंदा फूलसास गारी देवेदेवर समझा लेवेससुराल गेंदा फूल’….इन  गीतों की तो न जाने कितनी ही यादें हैंयदि ये गीत न होतेतो छोटे ग्वालों की गैया बड़ी न हो जातीकन्हैया कालिंदी में कैसे खेलतेमाँ गंगा कहाँ बिराजतींचंद्रमा शिव के मस्तक की शोभा कैसे बढ़ाताबहू अपनी सास से पानी न भरने के बहाने कैसे ढूँढतीऔर तो और बुंदियों के बरसने पर गोरिया का घूंघट कैसे भीगता और ससुराल गेंदा फूल कैसे बन पातादेखा न दोस्तों! इन लोक गीतों के ज़रिए प्रकृति के अलग अलग रूपों से हमारी ज़िंदगी कितना रोमानी और दिलखुश बना दिया है....यह भी उसे चित्रकार का कमाल है दोस्तों, है न..!

कभी उषा बेला में बाल सूरज को उदित होते तो देखिएकभी अपने प्रियतम को मधुमालती से लिपटी मुंडेर पर बुला कर तो देखिए.... तुलसी के क्यारी में सिर नवाकरशीश झुका कर तो देखिएगुलाब के गमले में लगी मुस्कानों के साथ मुस्करा कर तो देखिएक्षितिज पर शाम के समय लालिमा लिए सूरज को अपनी मुट्ठी में बांधकर तो देखिए और रात्रि के समय आसमान में जुगनुओं के समान टिमटिमाते तारों को अपनी चुनरी में टाँक कर तो देखिएइससे होगा क्याहोगा यह कि आपका सारा अहमनाराज़गीमन की चटकनव्यस्तताएँनकारात्मक भावनाएँसब काफ़ूर हो जाएँगी....और आप....आप एक नटखट शरारती बच्चे के समान किलोलने लगेंगेमृदंग की तरह बजने लगेंगे.....पतंग की अदृश्य डोर से बँधकर उड़ने लगेंगे। है न दोस्तों!

Music

और चलते   चलते बस यही कहूँगी दोस्तों! कि अच्छा हो अगर हम प्रकृति का सम्मान करना सीख लें और उसके ज़रिए मानव   मात्र की होने वाली सेवा को समझ लें। यदि ऐसा हो सका तो यकीननहमारी आँखों में आशासंतोषउम्मीद, विश्वास और खुशी के कई दीपक जल उठेंगे और हम जान ही जाएँगे कि आखिर ये कौन चित्रकार हैहै न दोस्तों!.....

याद रखिएगायह कुदरत हैप्रकृति हैतो हम हैइसके बिना हमारा अस्तित्व ही गौण है। कुदरत कीप्रकृति की बातें हैं अनंतऔर ये यूँ ही चलती रहेंगीइसीलिए कहती हूँ कि अब आप बताइए कुदरत से अपने प्रेम की कहानीअपने किस्से शेयर कीजिए..कीजिइएगा ज़रूर..मैसेज बॉक्स में लिखकर भेजिएभेजिएगा ज़रूरमुझे इंतज़ार रहेगा.....

और..आप भी तो इंतजार करेंगे न ....अगले एपिसोड का...करेंगे न दोस्तों!

सुनते रहिएसुनाते रहिएहो सकता हैयूँ ही बातें करते   करते आप मेरे साथ एक बार फिर कुदरत की मेहरबानियों के लिए शुक्रिया कहें। है न दोस्तोंमेरे चैनल को सब्सक्राइब कीजिए...मुझे सुनिए....औरों को सुनाइए....मिलती हूँ आपसे अगले एपिसोड के साथ...

नमस्कार दोस्तों!....वही प्रीत...वही किस्से   कहानियाँ  लिए.....आपकी मीत.... मैंमीता गुप्ता...

END MUSIC

 

*************************************************************

 

 

Comments

Popular posts from this blog

यूँ ही कोई मिल गया सीज़न-2

पल पल दिल के पास, वो रहता है...

जनरेशन अल्फ़ा और सिक्स-पॉकेट सिंड्रोम