धड़कनों की ख़ामोशी
यह रहा एक मार्मिक और भावनात्मक गीत, जो स्टेथीसकोप की धड़कनों के माध्यम से उस अनकही पीड़ा को उजागर करता है, जिसे अक्सर लोग सुन नहीं पाते — भले ही यंत्र कानों से लगा हो, पर मन की आवाज़ अनसुनी रह जाती है:
🎵 "धड़कनों की ख़ामोशी" 🎵
धड़कनों की ये सदा, कोई क्यों नहीं सुनता,
स्टेथीसकोप कानों पे, फिर भी मन क्यों है चुप सा।
साँसों की हर थरथराहट, कुछ कहना चाहती है,
पर भीड़ में ये आवाज़ें, अक्सर खो जाती हैं।
कभी दिल चीखता है, पर कोई सुनता नहीं,
धड़कनों की ख़ामोशी को, कोई पढ़ता नहीं।
यंत्र तो है पास में, पर जुड़ाव हैकहाँ,
इंसानियत की भाषा का, अभाव है यहाँ ।
साँसों की हर थरथराहट, कुछ कहना चाहती है,
पर भीड़ में ये आवाज़ें, अक्सर खो जाती हैं।
कभी माँ की ममता काँपे, बुख़ार में बच्चे का हाल,
डॉक्टर देखे तापमान, पर न देखे माँ का हाल।
कभी वृद्ध की आँखों में, बीते कल की पीड़ा हो,
पर रिपोर्ट की रेखाओं में, वो दर्द कहाँ लिखा हो।
साँसों की हर थरथराहट, कुछ कहना चाहती है,
पर भीड़ में ये आवाज़ें, अक्सर खो जाती हैं।
कभी दिल चीखता है, पर कोई सुनता नहीं,
धड़कनों की ख़ामोशी को, कोई पढ़ता नहीं।
यंत्र तो है पास में, पर जुड़ाव कहाँ है,
इंसानियत की भाषा का, अभाव यहाँ है।
साँसों की हर थरथराहट, कुछ कहना चाहती है,
पर भीड़ में ये आवाज़ें, अक्सर खो जाती हैं।
कभी कोई कह न पाया, जो कहना था ज़ुबाँ से,
धड़कनों ने कहा सब कुछ, पर समझा कौन धड़कन से।
काग़ज़ों की भीड़ में, वो सिसकियाँ गुम हो गईं,
संवेदना की राहें, मशीनों में खो गईं।
साँसों की हर थरथराहट, कुछ कहना चाहती है,
पर भीड़ में ये आवाज़ें, अक्सर खो जाती हैं।
क्या फ़ायदा उस यंत्र का, जो बस ध्वनि को सुने,
जब तक न हो दिल से दिल, तब तक दर्द अधूरे बने।
ज़रूरत है उस स्पर्श की, जो मौन को भी पढ़ ले,
जो धड़कनों की भाषा को, बिना शब्दों के कह दे।
साँसों की हर थरथराहट, कुछ कहना चाहती है,
पर भीड़ में ये आवाज़ें, अक्सर खो जाती हैं।
अब भी वक़्त है सुनने का, हर दिल की पुकार,
स्टेथीसकोप से आगे भी, है रिश्तों का संसार।
कभी रुक के सुनो ज़रा, उस धड़कन की बात,
शायद वहाँ छुपा हो, किसी जीवन का सौगात।
साँसों की हर थरथराहट, कुछ कहना चाहती है,
पर भीड़ में ये आवाज़ें, अक्सर खो जाती हैं।

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