पुस्तक समीक्षा: ‘तबेला’ – गुरुदत्त
पुस्तक समीक्षा: ‘तबेला’ – गुरुदत्त
‘तबेला’ गुरुदत्त द्वारा रचित कहानी-संग्रह है, जिसमें कुल आठ लघुकथाएँ शामिल हैं, जिसे पैंगुवीन स्वदेश के तहत 1971 में प्रकाशित किया गया। यह 237 पृष्ठों की पुस्तक ग्रामीण भारत के कोने-कोने से
उभरती मानवीय संवेदनाओं, मोह-माया और
अन्तर्निहित संघर्षों की गूँज पन्नों में भरती है। हर कथा एक अलग पड़ाव से शुरू होती है, जहाँ पात्र अपनी रोज़मर्रा की उलझनों और छोटे-बड़े
निर्णयों के बीच जूझते दिखते हैं। ग्रामीण
परिदृश्य में बसे किसान, आवारा पशु
चराने वाला बच्चा, एकाकी
वृद्धा और शहर लौटने का ख्वाब संजोए प्रवासी सभी कवचहीन भावनाओं के साथ उभरते हैं। गुरुदत्त का उद्देश्य बड़े घटनाक्रम पेश करना
नहीं, बल्कि जीवन के क्षणभंगुर लेकिन असरदार पलों को
पाठक की झप्पी में देना है।
गुरुदत्त की लेखन शैली में अनेक विशेषताएँ हैं|
पुस्तक की भाषा सरल और पारदर्शी है, जो तत्काल
पाठक को सहजता से कहानी में बसा लेती है। वे मनोवैज्ञानिक विश्लेषण के बजाय
पात्रों के भीतर छुपे भावों का धीमा, फिर भी
सशक्त उद्घाटन करते हैं। संवादों में क्षेत्रीय बोलियों का अंश है, जो कहानी को प्रामाणिक ग्रामीण तड़के से परिपूर्ण
करता है।
कहानियों की मुख्य विषय-वस्तु अस्मिता बनाम आर्थिक ज़रूरतें, सामूहिक
परंपरा और वैयक्तिक स्वतंत्रता का द्वंद्व, पीढ़ियों के बीच विरासत और
परिवर्तन, मौन प्रतिशोध और अनकहे दर्द आदि इन्हें सशक्त बनाते हैं|
‘तबेला’ गुरुदत्त का एक ऐसा साहित्यिक अनुभव है, जो ज़मीनी कथानक, सधे हुए भाव
और यथार्थ की खुरदरी बनावट को एक साथ प्रस्तुत करता है। अगर आप धीमे, परतु गहरे प्रवाह वाली कहानियों में खोना चाहते
हैं, तो यह संग्रह आपकी पढ़ने की सूची में अवश्य जगह
बनाएगा।
डॉ मीता गुप्ता
साहित्यकार

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