EPISODE-14 किताबें बहुत-सी पढ़ी होगीं 17/07/26
EPISODE 14
किताबें बहुत सी पढ़ी होगीं 17/07/26
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नमस्कार दोस्तों! मैं मीता गुप्ता, एक आवाज़, एक दोस्त, किस्से कहानियाँ सुनाने वाली आपकी मीत। जी हाँ, आप सुन रहे हैं मेरे पॉडकास्ट, ‘यूँ ही कोई मिल गया’ के दूसरे सीज़न का अगला एपिसोड..जिसमें फिर से हैं, नए जज़्बात, नए किस्से, और वही
पुरानी यादें..उसी मखमली आवाज़ के साथ...। जी हाँ दोस्तों, आज हम
बात करेंगे, किताबों की, आप कहेंगे, कुछ बोरिंग हो रहा है, क्या पढ़ने पढ़ाने की बातें लेकर बैठ गईं? पर
दोस्तों, मैं आपसे यह पूछना चाहती हूँ कि क्या
किताबें केवल कागज़ पर छपे अक्षरों से ही बनती है? क्या ज़िंदगी की भी कोई किताब होती है, जिसे हम पढ़ते हैं, गुनते
हैं? एक शेर में शायर कहता भी तो कहता है
किताब ए दिल
का कोई भी पन्ना सादा नहीं होता,
निगाह उस को भी पढ़ लेती है, जो लिखा नहीं होता।
(मोहन त्रिपाठी जी)
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जी हाँ दोस्तों! हम ज़िंदगी भर अनगिनत
किताबें पढ़ते हैं और इन किताबों में मन के प्रश्नों के उत्तर खोजते हैं, न जाने कितनी किताबें पढ़ डाली होंगी अभी तक
मैंने भी, कितनी ही किताबें पढ़ी होंगी, आपने भी, कुछ
थोड़ी थोड़ी याद रह गईं, कितनी ही पढ़ कर भूल गए। लेकिन कुछ किताबें ऐसी
भी होती हैं, जो हमें ताउम्र याद रहती हैं।
दोस्तों! हम सभी अपनी अपनी ज़िंदगी जीते
हैं, कोई अपने लिए जीता है, तो कोई किसी और के लिए अपना पूरा जीवन गुज़ार देता
है। यह जीवन भी तो एक किताब ही है ना, जिसे हम जन्म के दिन से लिख रहे हैं और अंतिम दिन तक लिखते रहेंगे। कितने हज़ारों लाखों शब्दों से अपने जीवन की किताब को लिख डाला, कौन जाने? कैसा लिखा? अधूरा
लिखा या पूरा? खुशी
लिखी या गम? कभी सोचा ही नहीं, बस लिखते चले गए। कभी इस किताब को पढ़ने की
सोची ही नहीं, और जिस दिन पढ़ने बैठे, उस दिन किताब ही रूठ गई, बोली, अब बहुत देर हो चुकी है, अब सो
जाओ तुम।
क्यों समय रहते जीवन की किताब नहीं
पढ़ी हमने? भूल गए क्या? या फिर हम आलस से भर गए? अंतिम नींद से पहले हमें सारी किताब पढ़ लेनी
चाहिए थी। हम रोज़ रोज़ नए नए पन्नों पर हर पल
का हिसाब लिखते चले गए, बही
खाते लिख लिख कर खुश होते चले गए, लेकिन उन खातों को, इन पोथियों को कभी गलती से भी उलट पलट कर देखा नहीं।
क्या बहुत बिजी रहे? किसी
दिन फ़ुरसत मिली भी तो...? कोशिश की थी क्या? फिर
बड़ी कोशिशों के बाद, मशक्कत के बाद, किसी दिन फुर्सत से अगर देखने बैठे, कुछ पन्ने पलटे, तो पाया कि हमारी ज़िंदगी का पहला पन्ना हमारे जन्म से शुरू हो चुका है।
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दोस्तों, रोज़ एक नई इबारत, रोज़ एक नई इमारत, बचपन की वो कागज़ की कश्ती, वो बारिश का पानी, गुड्डे गुड़िया
के ब्याह और इन्हीं में रंगे रंगे से कुछ
पन्ने, कभी आम के पेड़ से कच्चे आम चुराने
के आनंद से सराबोर कुछ पन्ने, कुछ
आगे बढ़ें, तो युवावस्था के इंद्रधनुषी पन्ने, जिनमें कहीं प्रेम का सुर्ख गुलाब है, तो कहीं पीले नारंगी एहसासात...इंद्रधनुषी रंग, ऐसे रंग जो हमारी जवानी के रंग में रंगे थे। कहीं फागुन के रंग हैं, तो कहीं सावन की रिमझिम फुहार से भीगे पन्ने। इस
किताब में कुछ पन्ने गुलाबी और थोड़े सुर्ख भी हैं, जिन पर लिखी हैं प्रेम की, इज़हार की, मिलन की इबारत, ये
पन्ने इस किताब के सबसे चमकीले पन्ने हैं, जो पूरी ज़िंदगी हमें रोमांचित करते रहे, हम इन्हें बार बार पढ़ना चाहते हैं क्योंकि प्रेम के ये पन्ने कभी बदरंग नहीं होते,
ये उम्र के हर मोड़ पर हमें लुभाते हैं, बुलाते है, आकर्षित करते हैं। इन पन्नों
पे हमने अपनी सबसे सुंदर भावनाएँ दर्ज की हैं। लेकिन..लेकिन देखो तो ज़रा इस किताब
की कुछ पन्ने स्याह क्यों हैं? काले नीले सलेटी और थोड़े बदरंग भी..? राख जैसे धूसर...ज़रूर ये दर्द दुःख और पीड़ा के पन्ने होंगे, तनहाइयों के पन्ने होंगे , इंतज़ार के पन्ने होंगे, जो आँसुओं से भीग भीग कर गल गए हैं। ज़रा ध्यान से....इन्हें ज़रा आराम से उलटना पलटना, वरना ये चूर चूर हो जाएँगे
और चिंदी चिंदी हो कर चारों ओर फैल
जाएँगे। ये दर्द के पन्ने, हम
दोबारा कभी पढ़ना नहीं चाहते। इन्हें पढ़ने से हमारा अंतर्मन दुखी होता है, हम दुख के सागर में डूब जाते हैं। ये काले धूसर पन्ने हमें बिल्कुल नहीं सुहाते।
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चलिए, अब आगे बढ़ते हैं, आगे इस
किताब में कुछ सतरंगी पन्ने जगमगा रहे हैं। इनमे दर्ज है, किसी की मुस्कराहट, जो कभी उसके होठों पर हमने सजाई थी, या किसी ने रख दी थी हमारे होंठों पर। ये हँसी ख़ुशी के पन्ने....मुहब्बत के पन्ने..मुरव्वत
के पन्ने..इंसानियत के पन्ने..सतरंगी इंद्रधनुषी
पन्ने..सब झूम झूम कर मुझे बुलाते
हैं...देखो न...कितने मासूम..कितने कोमल हैं ये पन्ने।
अरे यह क्या?...हमने किताब में ये कुछ पन्ने, मोड़ कर क्यों रखे हैं? ये तो शायद बिल्कुल निजी हैं, मेरे अपने पन्ने हैं, शायद इनमें मैने अपने निजी पलों को छिपा कर रख दिया है। ये पन्ने, मेरे गिर कर उठने का हिसाब रखते हैं, फ़र्श से अर्श की हमारी सीढ़ी की ऊँचाई पर नज़र रखते
हैं, मेरे आँसू कब मेरी शक्ति बन गए, इसका ब्योरा रखते हैं, ज़िंदगी की किताब के ये पन्ने हमें जीने का हौसला
देते हैं। तनहाइयों में जब कोई पास नहीं होता, तो ये हमें प्यार से थपकी देते हैं। कभी हमारे
कांधे पर हाथ रख देते हैं, हमें
सहारा देते हैं, कहीं जब हम फिसलने लगते हैं, गिरने लगते हैं, तो एक छोटी सी ऊँगली का
सहारा देकर ये हमें उठा लेते हैं, हमारा
संबल बनते हैं.. फिर हमारी आँखों से आँसुओं की गर्म धारा बहने लगती है। पर इन्हें
छूना नहीं, ये बहुत ही कोमल हैं| दुनिया केवल ऊंचाई देखती है, मंज़िल देखती है, उस मंज़िल तक का सफ़र, पथरीला
सफ़र किसी को दिखाई नहीं देता, उसी का
हिसाब किताब है इन पन्नों में, ये पन्ने मुझे अहंकार करने से भी रोकते रहते हैं,
मुझे जमीन पर रखने का काम भी यही तो करते हैं।
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चलिए दोस्तों! अब आगे पन्ने पलट कर देखते हैं, पर ये क्या? इन पर तो कुछ लिखा ही नहीं हैं, बिल्कुल कोरे..बिल्कुल कोर .आखिर क्यों? इन पन्नों में शायद कुछ ख़ास है..ये पन्ने उन भावनाओं, उन ख्वाहिशों के नाम के पन्ने हैं, जो कभी व्यक्त नहीं किया जा सकी, बहुत सी अनकही बातें छुपी हैं यहाँ, बहुत सी अनकही बातें लिखी जाएँगी यहाँ, बहुत से अनकहे फ़साने अफ़साने छुपे हैं यहाँ,बहुत से अनकहे फ़साने अफ़साने लिखे जाएंगे यहां, अभी कुछ नहीं लिखा गया है ,अगर कुछ लिखा भी गया है, तो दिखता नहीं है....ऐसी हैं ये बातें। इसलिए ये पन्ने आज खाली दिखाई देते हैं..संवेदनाओं के नाम लिखे गए ये पन्ने हैं..छोड़े गए हैं ये पन्ने। वैसे शब्दों में इतना सामर्थ्य है भी कहाँ कि वे किसी की भावनाओं को, संवेदनाओं को, इच्छाओं को, सपनों को पूरी तरह व्यक्त कर सके? सारा अनकहा इन्हीं पन्नों पर लिखा है। चाहे वे टूटी फूटी ख्वाहिशें हों, आधे अधूरे अरमान हों, अफ़साने हों, फ़साने हों, रिश्ते हों, कुछ प्रेम भरे ख़त हों, ऐसे खत,जो कभी लिखे ही नहीं गए और अगर लिखे भी गए, तो कभी भेजे नहीं गए। कुछ आँसू, जो गालों पर ही सूख गए, कुछ अनकही बातें, जो होंठो के किनारे पर ही चिपककर रह गईं। दोस्तों! इन पन्नों को पढ़ने की नहीं, महसूसने की ज़रुरत है। इन्हें भी छूना मना है, क्यों ? क्योंकि ये बहुत कोमल हैं, इनके मुरझाने का डर है,आप छुए नहीं,।
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दोस्तों!
ज़िंदगी की किताब कई पन्नों से पूरी
है,
पर कुछ कहानियाँ हैं, जो लफ़्ज़ों में भी अधूरी हैं।
(साभार फ़ेसबुक)
अरे! इस किताब के आख़िरी कुछ पन्ने फटे हुए से क्यों दिखते हैं? ज़रुर ये वो पन्ने होंगे, जो ज़िंदगी की किताब से हमेशा हमेशा के लिए दूर हो गए। मगर उनसे अलग होने के निशान किताब पर बखूबी देखे जा सकते हैं। बहुत से रिश्ते, बहुत से नाते, बहुत से प्रिय, बहुत से अपने..जो हमसे छूट गए, जो हमसे रूठकर सदा सदा के लिए चले गए, जिनके लिए मन आज भी तड़पता है और कहता है, कहाँ गया उसे ढूंढो..ऐसे रिश्तों के निशान अमिट होते हैं, हम इन्हें भूलना भी चाहें, तो भी दिल इन्हें भूलने नहीं देता। क्योंकि यही तो हैं वे पन्ने, जिनमें उनकी यादें बसी हुई हैं, उनके प्यार की यादें, उनके साथ की यादें, उनके रिश्तों की यादें..यादें..जो हमेशा तड़पाती हैं।
तो दोस्तों, ये है ज़िंदगी की किताब...हर एक की अपनी किताब होती है..अब हमें तय यह करना है कि हम इसे किस तरह संजोते हैं? किस तरह पढ़ते हैं? किस तरह लिखते हैं? या फिर पन्नों को फाड़ डालते हैं? हमारे दुनिया से जाने के बाद हमारे इन पन्नों को कोई प्रेम से क्यों पढ़ना चाहेगा? इसके लिए कुछ तो करना ही होगा। क्यों न ऐसी किताब बन जाएँ, जिसमें सूखे हुई गुलाब के फूल सदियों सदियों तक महका करें और कहते रहें कि रहें न रहें हम, महका करेंगे बनके कली, बनके सबा बागे वफ़ा में..है न दोस्तों..!
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तो देखा आपने, ज़िंदगी की इस किताब में असंख्य पन्ने हैं, पृष्ठ पलटते जाइए, देखिए,
ज़िंदगी क्या क्या रंग दिखाती है, सारे
रंग समाए हैं इसमें। जब असंख्य रंग हैं इस किताब में, असंख्य पृष्ठ हैं इसमें, असंख्य
कही अनकही बातें, असंख्य जज़्बात, असंख्य
भावनाएं, तो बातों का सिलसिला भी लंबा ही होगा
न, इसीलिए कहती हूँ कि अब आप बताइए,
अपनी कहानी, अपने किस्से, अपने जीवन की किताब के पन्ने । अपनी ज़िंदगी के किस्से कहानियाँ हमें सुनाइए..सुनाइएगा ज़रूर..। मैसेज बॉक्स में लिखकर भेजिए,
भेजिएगा ज़रूर, मुझे इंतज़ार रहेगा.....
और..आप.. अरे आप भी तो इंतजार करेंगे न
....अगले एपिसोड का...करेंगे न दोस्तों!
सुनते रहिए, सुनाते रहिए, हो सकता है, यूँ ही
बातें करते करते आप अपनी ज़िंदगी की किताब
के कुछ शब्द पढ़ सकें, उसे पढ़ने की फ़ुरसत निकाल सकें,
क्योंकि यह बेहद ज़रूरी है दोस्तों, है न ? इसीलिए
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अगले एपिसोड के साथ...
नमस्कार दोस्तों!..वही प्रीत..वही
किस्से कहानियाँ लिए..आपकी मीत..मैं, मीता गुप्ता...
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