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Showing posts from July, 2025

राखी का धागा

  राखी का धागा राखी का ये बंधन प्यारा, सावन सा भीगा-सारा। तेरी कलाई पे जो लिपटा है, वो मेरा सारा सहारा। न  माँगी  कोई  धन-संपत्ति, न माँगा कोई ताज-मुकुट। बस माँगा  एक छोटा सा वादा, "संग रहूं मैं हर संकट-संग जुट।" रक्षा का अर्थ तलवार नहीं, ना ही कोई रण का मैदान। बहन के आँसू पोंछ सके, वही है सच्चा महान इंसान। आज भी वो बचपन का आँगन, जहाँ तू मुझे चिढ़ाया करता। कभी मेरी चोटी खींच के, फिर खुद ही चुपचाप मनाता रहता। अब जब तू दूर बहुत है, शहरों की भागदौड़ में खोया। फिर भी राखी जब भी आई, तेरी यादों ने हर कोना भिगोया। डाक से भेजूं, या व्हाट्सऐप पे, राखी की तस्वीर सजा दूं? पर जो एहसास धागे में है, क्या वो मोबाइल में लिपटा दूं? माना अब तू मुझसे दूर है, और जिम्मेदारियाँ हैं भारी। पर एक बहन की कोमल आस, अब भी है तुझसे वही प्यारी। तो आज इस रक्षा बंधन पर, ना सिर्फ रक्षा का वचन देना। बल्कि बहनों के सपनों को, पंखों सी ऊँचाई भी देना।

फिर बहा दो, एक गंगा

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  ढलने दो, उम्र की धूप सारी ले जाओ बेबसी और, लाचारी । दो नया इतिहास जग को, तुम सजाओ, फिर से क्यारी । छोड़ दो, बेकार बंधन, जिनसे न,बनता कोई जीवन । तुम उठो, दुनिया उठाओ, फिर खिला दो, एक गुलशन । जीत लो, विश्वास अपना, नहीं बंदी हैं, हम किसी के । स्वतंत्र है, जहां में अपने, चूम लो, हर क्षण, हर पल । जो ना रीते, जो ना बीते, छेड़ दो इक, ऐसा राग । सान कर दुनिया के दुख को, बांध लो इक, मीठी तान । छोड़कर, बंधन सुनहरे, सत्य से, पहचान कर लो । सह लो, दुनिया के दुख को, यूं मुस्कराते, गुनगुनाते । गुनगुनाना ही पावन है, मुस्कराना ही सृजन है । फिर बना दो, एक उपवन, फिर बसा दो, एक आंगन । छोड़कर स्वार्थ सारे, तुम भुला दो, भेद सारे । फिर मिटा लो, भेद सारे, फिर नहा लो, इस सागर में । आकाश गंगा, करती है स्वागत, दो नया विश्वास विश्व को । फिर बहा दो, एक गंगा, फिर बहा दो, एक गंगा । 

हरितालिका तीज: परंपरा और युवा दृष्टिकोण

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  हरितालिका   तीज: परंपरा और युवा दृष्टिकोण आज परब हे खास जी , तीजा तीज तिहार । आथे मइके मा बहिन ,   पाथे मया दुलार ।। भादो महिना आय जी , पुरखौती ये रीत । सबो सुहागिन मन सदा , गावँय सुमधुर गीत ।। पहिरे लुगरा पोलका , टिकली चमके माथ । चूरी   कंगन   हे   सुघर ,   लगे   महेंदी   हाथ ।। घर-घर मा खुरमी बरा , सुघर बने हे आज । शिव भोला के जाप ले , पूरन होवय काज ।। भारत त्योहारों की भूमि है। हर पर्व न केवल धार्मिक आस्था से जुड़ा होता है , बल्कि उसमें सामाजिक , सांस्कृतिक और मानवीय मूल्य भी निहित होते हैं। हरितालिका तीज , ऐसा ही एक पर्व है , जो विशेष रूप से नारी शक्ति , प्रकृति प्रेम , आत्मसंयम और पारिवारिक रिश्तों का प्रतीक है। हरितालिका तीज भारतीय संस्कृति का एक प्रमुख त्योहार है , जो विशेष रूप से उत्तर भारत में महिलाओं द्वारा श्रद्धा , उमंग और उल्लास से मनाया जाता है। यह पर्व सावन मास की शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को मनाया जाता है , जब चारों ओर हरियाली , बारिश की रिमझिम , और प्रकृति का उल्लास चरम पर होता है। यह पर्व भगवान शिव और माता ...

रहें न रहें हम

  रहें न रहें हम किताब-ए-दिल का कोई भी पन्ना सादा नहीं होता , निगाह उस को भी पढ़ लेती है , जो लिखा नहीं होता| जी हां दोस्तों! हम ज़िंदगी भर अनगिनत किताबें पढ़ते हैं और इन किताबों में मन के प्रश्नों के उत्तर खोजते हैं , ना जाने कितनी किताबें पढ़ डाली होंगी। अभी तक मैने भी कितनी की किताबें पढ़ी होंगी , कुछ थोड़ी-थोड़ी याद रह गईं , कितनी ही पढ़ कर भूल गई। लेकिन कुछ किताबें ऐसी भी होती हैं, जो हमें ताउम्र याद रहती हैं। दोस्तों! हम सभी अपनी-अपनी ज़िंदगी जीते हैं , कोई अपने लिए जीता है, तो कोई किसी और के लिए अपना पूरा जीवन गुज़ार देता है। यह   जीवन भी तो एक किताब ही है ना , जि स लिए हम जन्म के दिन से लिख रहे हैं और अंतिम दिन तक लिखते रहेंगे। कितने हजारों-लाखों शब्दों से अपने जीवन की किताब को लिख डाला, कौन जाने ? कैसे लिखा है? अधूरा लिखा है या पूरा लिखा ? खुशी लिखी है या गम लिखा? कभी सोचा ही नहीं, बस लिखते ही चले गए| कभी इस किताब को पढ़ने की सोची ही नहीं और जिस दिन पढ़ने बैठे, उस दिन किताब ही रूठ गई, बोली, अब बहुत देर हो चुकी है , अब सो जाओ तुम। क्यों समय रहते हमने जीवन की कि...