EPISODE-9 राँझा राँझा करदी.. 08/05/2026

EPISODE   9

राँझा राँझा करदी.. 08/05/2026

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नमस्कार दोस्तों! मैं मीता गुप्ताएक आवाज़एक दोस्तकिस्से   कहानियाँ सुनाने वाली आपकी मीत। जी हाँआप सुन रहे हैं मेरे पॉडकास्ट, ‘यूँ ही कोई मिल गया’ के दूसरे सीज़न का अगला एपिसोड ... जिसमें हैंनए जज़्बातनए किस्सेऔर वही पुरानी यादें...उसी मखमली आवाज़ के साथ...। जी हाँ दोस्तोंआज मैं बात करूंगी सच्चे प्रेम की सबसे मार्मिक कहानी की, जो संवेदनाओंविद्रोहआत्म   त्याग और आध्यात्मिक प्रेम की गहराइयों को छूती है। जी हाँ दोस्तों, आज हम बात करेंगे, हीर और राँझा की..

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 राँझा राँझा करदी हुण मैं आपे राँझा होई

सद्दो मैनूं धीदो राँझा हीर ना आखो कोई।

दोस्तों! बुल्ले शाह ने आखिर यह क्या कह दियाउनके शब्दों में हीर कहती है कि राँझा   राँझा करती हुई मैं खुद ही राँझा हो गई हूँअब सब मुझे राँझण धीदो पुकारा करेंकोई मुझे हीर कहकर न पुकारे। कहानी में एक था राँझाजो प्रेम का देवता थाऔर एक थी हीरजो सुंदरता की देवी थी। पंजाब की धरती पर दोनों का जन्म हुआ। उस समय विदेशी घोड़ों की टापों से देश की धरती उखड़ रही थी। इतिहास का ध्यान लगा था राजनीतिक उथल   पुथल की ओरकिसी का ध्यान इस ओर जाता तो जाता कैसे कि हीर को भी इतिहास के पन्नों में दर्ज कर दें। क्या हीर सचमुच थीझंग में हीर की समाधिजिस पर प्रति वर्ष हज़ारों श्रद्धालुओं का एकत्रित होनाइस बात की घोषणा करता है कि हीर सचमुच में थी, जी हाँ, हीर थी, इसी धरती पर, तभी तो आज भी उसके किस्से मशहूर हैं।

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झंगजहाँ हीर का जन्म हुआरांझे के जन्मस्थान तख़्त हज़ारे से अस्सी मील की दूरी पर है। पास से चनाब गुज़रती है। 'चनाबयानी 'झनां'। झनां तो आज भी हीर को याद करती होगीउसकी लहरों के सम्मुख ही तो पहले   पहल उसने राँझा के लिए अपने हृदय के द्वार खोले थे। सोचती हूँ, कि पहली बार जब किसी लोकगीत में हीर की कथा का ज़िक्र आया होगातब क्या अकेली हीर को ही अमर पदवी दी गई थीझनां नदी भी तो इसमें आई होगी। और हीर संबंधी पहला गाना अब हम कहाँ ढूँढ़ेंयह हीर की ही खासियत रही होगी कि ‘हीर’ एक गीत बनकर पंजाब की लोकधारा में बहने लगा, जैसे चनाब की लहरें, झनां की लहरें। इन गीतों में हीर को लोकमाता की पदवी दी गईजो प्रेमसौंदर्य और साहस की प्रतीक बनकर उभरती है। कई गीतों में तो चनाब यानी झनां को प्रेम की नदी कहा गया—

"इश्क झनां वगदीकिते डुब्ब न मरी अणजानां"

यानी “इश्क की झनां बह रही हैअरे ओ अनजानकहीं डूब न जाना”।

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कभी झनां के तीर पर बैठकर उसके जल को निहारिएतो शायद वह आपके कान में कुछ कह जाएनिराश होकर एक दिन रांझे ने किस तरह आँसू गिराए थेआँसू बहाए थेशायद झनां ही आपको बतला सके। जिस झनां ने रांझे की बंझली का गान सुना थादिन   रात, लगातारजिसने उसे हीर के पिता की भैंसें चराते देखा थाजिसने हीर को रांझे के लिए पकवान लाते देखा थावह क्या आज बोल न उठेगी?

हीर और राँझा की प्रेमकथा के बारे में क्या कहूँ? राँझा का असल नाम ‘धीदो’ था| उसे पिता का देहांत बचपन में ही हो गया था। एक दिन उसकी भावजों ने ताना मारा कि वह काम   काज में विशेष हाथ नहीं बंटाता हैछैला बना घूमता हैजैसे उसे 'हीरसे ब्याह करना हो। बस, फिर क्या था, बस घर छोड़कर चल पड़ा वह झंग की ओर। झनां के तीर पर पहुँचा, अब किश्ती से झंग जाने का प्रश्न था। पैसा पास में था नहीं। बिना पैसे के 'लुढ्ढननाविक उसे ले जाने को तैयार न था। रांझे ने बंझली बजाईलुढ्ढन की पत्नी को उस पर तरस आ गया, उसने सिफ़ारिश की, और लुढ्ढन ने रांझे को नदी के उस पार, जहाँ हीर रहती थी, पहुँचा दिया। और फिर शुरू हो गया हीर और राँझा के प्रेम का सिलसिला.. शादी तय भी हुई, पर फिर विघ्न आ गया और हीर का विवाह सैदा से कर दिया गया। हीर की विद्रोही आत्मा ने सामाजिक बंधनों को चुनौती दे डाली| दोनों के प्रेम का सैलाब देखिए, कि वह राँझा के लिए अपने परिवारजाति और परंपरा से टकराई, परंतु उसकी एक न चल पाई। तब हीर ने प्रण कर लिया कि वह अपने ‘सत’ को कायम रखेगी। कहते हैं, हीर की सच्ची मुहब्बत को जानकार राजा के आदेश पर पिता राँझा से उसके विवाह को मान गए, पर..पर भीतर ही भीतर कपट का साँप फुंकार रहा था। राँझा बारात जुटाकर लाया, पर हीर को ज़हर दे दिया गया। ज्यों ही रांझे को यह ख़बर लगी, वह ग़श खाकर गिर गया—एक दीपक पहले ही बुझ चुका थादूसरा भी बुझ गया। इसीलिए ‘हीर’ के कण   कण में राँझा की बंझलीउसका जोगऔर “अलख निरंजन” का जाप अपनी पूरी शिद्दत के साथ समय गया, लगता है कि यह प्रेम, आध्यात्मिक प्रेम  है—जो साँसारिक नहींआत्मिक है।

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दोस्तों! प्रश्न यह है कि क्या किसी को यह अधिकार था कि वह हीर और राँझा के प्रेम को किसी चारदीवारी में कैद कर सकेआखिर समाज को यह अधिकार किसने दिया? भक्त गुरुदास कहते हैं—

राँझा हीर बखानिये,ओह पिरम पिराती।‘

यानी 'आओ हीर और राँझा का बखान करें,वे महान प्रेमी थे!'

रांझे के पास जो बंझली थीहीर उसके राग पर मुग्ध हो उठी थीकई लोग बंझली की प्रशंसा भी करते दिखाई देते हैं। राँझा जो कुछ भी बोलता थाजैसे वह बंझली में से होकर हीर के हृदय में उतर जाता था। बंझली से एक बार जो शब्द गुज़र जाता थावह कविता बन जाता था, आकाश भी बंझली से थाप से नरम पड़ जाता था|

राँझा बजावे बंझलीसुक्का अम्बर छड्डे नरमाइयाँ।’

यानी देखो! राँझा मुरली बजा रहा हैसूखे आकाश पर नमी आती जा रही है।'

दरअसल दोस्तों! हीर और राँझा केवल दो प्रेमी नहींबल्कि वे प्रेमबलिदान और सामाजिक बंधनों के विरुद्ध विद्रोह के प्रतीक हैं। इन दोनों की कहानी सिर्फ एक रोमांटिक कहानी नहीं है—यह उस दौर की सामाजिक बाधाओंजातिगत भेदभावऔर पारिवारिक दबावों के बीच सच्चे प्रेम की जीत या हार, इसका फ़ैसला मैं आप पर छोड़ती हूँ, का मार्मिक चित्रण है।

यदि यह हार है भी दोस्तों, तो भी ऐसी हार के किस्से अक्सर प्रेरणा बन जाते हैंजो हमें बेहतरमजबूतऔर समझदार इंसान बना देते हैं। हार हमें खुद से सवाल करने पर मजबूर करती है—हम क्या कर सकते थेक्या नहीं कियाऔर आगे कैसे सुधारें? गिरकर उठने से हमारा जज़्बा ही हमारे भीतर सहनशीलता बढ़ाता है। ये पाठ किसी किताब से नहीं मिलते। तो दोस्तों! जब हम हीर राँझा की प्रेम कथा सुनते हैंतो हार जाने के डर से जीना नहीं छोड़तेसामाजिक बंधनों पर सवाल करना सीखते हैंऔर हम अपने रास्ते या सोच को फिर से परिभाषित करते हैं। यही है हीर   राँझा की कहानी, मेरी जुबानी।

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दोस्तों! हीर   राँझा, सोहनी   महिवाल, ऐसे न जाने कितनी प्रेमगाथाएँ हमारे सामाजिक ताने   बाने में धूप   छाँव की तरह बुनी हुई हैं, गुँथी हुई है। ये हमारी भावनाओं की अभिव्यक्ति ही नहींबल्कि साँस्कृतिक स्मृति और सामाजिक चेतना का दस्तावेज़ भी हैं। हम सभी की भावनाओं में सबसे प्रभावशाली संवेग होता है   प्रेमप्रेम के ऐसे बहुत से अनुभव, बहुत से किस्से   कहानियाँ आपके पास भी होंगी। मुझे मैसेज बॉक्स में अपने प्रेम से भरे किस्से प्रेषित कीजिएभेजिएगा ज़रूरमुझे इंतज़ार रहेगा.....और आप भी तो इंतजार करेंगे न ....अगले एपिसोड का...करेंगे न दोस्तों!

सुनते रहिएहो सकता हैहीर   राँझा की कहानी में आपके भी किस्से छिपे हों.....! मेरे चैनल को सब्सक्राइब कीजिए...मुझे सुनिए....औरों को सुनाइए....मिलती हूँ आपसे अगले एपिसोड के साथ...फिर एक नए किस्से के साथ.. 

नमस्कार दोस्तों!....वही प्रीत...वही किस्से   कहानियाँ  लिए.....आपकी मीत.... मैंमीता गुप्ता...

END MUSIC

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