सावन को आने दो

सावन को आने दो

सावन को आने दो



सावन को आने दो, घनघोर घटाएँ छाने दो,
बूँदों की रुनझुन को, मन की वीणा पर गाने दो।


धरती की प्यास बुझाने दो, नदियों को मुस्काने दो,
सूखे मन के सूने कोनों में हरियाली लहराने दो।


झूले डालें पीपल पर फिर, गीत पुराने गाए जाएँ,
बचपन की यादों में खोकर, मन फिर से भीग जाए।


कचनारों पर नाचे मोर, बगिया में बहे सुवास,
प्रेम की पहली बूँदों में, लिख दें नए एहसास।


सावन को आने दो, आँगन को हरा बनाने दो,
भीग जाए मन की मिट्टी, कुछ स्वप्न नए सजाने दो।

सावन को आने दो, घटाओं को गहराने दो,
मन की भीगी चादर में, फिर से हर रंग छाने दो।

माँ की डाँट, भीगे कपड़े, और वो छत की फिसलन,
सब याद दिला जाए फिर से वो बारिश वाली सरगम।


पीपल पर झूला झूलें, सखियाँ गीत सुनाएँ,
गाँव की गलियों में फिर से, सावन झूम के आए।


धरती की सूखी बाहों में, हरियाली मुस्काए,
मन के कोरे काग़ज़ पर, प्रेम-बूँद कुछ लिख जाए।


टप-टप बूँदें गिरें छतों पर, जैसे राग सुनाने को,
झींगुर गाएँ कोने-कोने, मेंढक टर्राएं गाने को।

आओ सब कुछ भूल चलें, उस बचपन की गलियों में,
जहाँ झींगुर गाते थे रातें, और मेंढक बोलें थीं नदियों में।


बचपन की वो कश्ती काग़ज़ की, फिर से तैरे पानी में,
नाले की लहरों से बोले, चलो साथ कहानी में।


सावन को आने दो, vo  बचपन लौटाने दो,
बरसों से भीगा जो कोना था, उसे फिर से मुस्काने दो।


मेघ बरसें मन-आँगन में, दुख सारे बह जाने दो,
सावन को आने दो, बस सावन को आने दो।



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