EPISODE-13 क्या कभी खुद से प्रेम किया? 03/07/26
EPISODE 13
क्या कभी खुद से प्रेम किया? 03/07/26
INTRO MUSIC
नमस्कार दोस्तों! मैं मीता गुप्ता, एक आवाज़, एक दोस्त, किस्से कहानियाँ सुनाने वाली आपकी मीत। जी हाँ, आप सुन रहे हैं मेरे पॉडकास्ट, ‘यूँ ही कोई मिल गया’ के दूसरे सीज़न का अगला एपिसोड ... जिसमें हैं, नए जज़्बात, नए किस्से, और वही
पुरानी यादें...उसी मखमली आवाज़ के साथ...। जी हाँ दोस्तों, आज हम
बात करेंगे, प्रेम की, और वह भी खुद से प्रेम की.. भला यह भी क्या बात
हुई? हम तो इससे प्रेम करते हैं, उससे प्रेम करते हैं, भला अपने से, खुद से
प्रेम का क्या औचित्य? आखिर
क्या है आत्ममुग्ध होना? क्या
यह आत्मकेंद्रित होना है? खुद से
प्रेम करना.. आखिर इसका अर्थ क्या है? क्या आत्ममुग्ध या आत्मकेंद्रित होकर भी हम दूसरोंं से प्रेम कर सकते
हैं? आइए, इन्हीं सब बातों पर करते हैं आज चर्चा..
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दोस्तों! वह गीत तो आपने ज़रूर सुना
होगा..सजना है मुझे.. ज़रा उलझी लटें सँवार लूँ, हर अंग का रंग निखार लूँ, कि सजना है मुझे.. सच कहूँ, तो अपने को सजाने सँवारने में
संकोच कैसा? अक्सर लोग जब रिश्तों और संबंधों पर
चर्चा करते हैं, तो खूब शिकायत करते हैं कि फलां
व्यक्ति से उन्होंने बहुत प्रेम किया, उसके साथ समय नष्ट किया, मंहगे
तोहफ़े दिए, पर.. पर कोई फ़ायदा नहीं हुआ। गोया कि
किसी फायदे के लिए प्रेम किया हो? या कि
ये सब बेकार की बातें हैं, कभी
किसी से प्रेम करना ही नहीं चाहिए, सब
धोखेबाज होते हैं, कोई किसी का नहीं, आदि आदि।
कुछेक महिलाएँ खुद से ही प्रेम करने की सलाह देती दिखाई देती हैं, कि दुनिया के सभी पुरुष बहुत बुरे हैं, इसलिए खुद से प्रेम करो और खुश रहो। तो कहीं
पुरुष कहते हैं, कि महिलाएं बहुत चालाक और फ़रेबी हैं, इनसे बचो, इनसे दूर रहो, खुद
में खुश रहो।
क्या सिर्फ़ खुद से प्रेम किया जा
सकता है? आत्मकेंद्रित या आत्ममुग्ध होकर भी
क्या आप खुश रह सकते हैं? मेरे
ख्याल से सबसे ज़्यादा कुंठित तो वे ही लोग होते हैं, जो आत्ममुग्ध होते हैं और एक दिन अपनी ही कुंठाओं में डूब जाते हैं।
ये आत्ममुग्ध कभी किसी से प्रेम नहीं कर पाते, वे अपनी ही चाहत के घेरे में कैद होकर रह जाते हैं, खुद तो मरते ही हैं साथ ही प्रेम को भी नष्ट कर
देते हैं। मेरी एक मित्र हैं, उनसे
जब मिली, तो उन्होंने बड़ी शान से मुझे कुछ
तोहफ़े दिखाए, जो उनके नए प्रेमी ने उन्हें दिए थे
और वे तोहफे भी दिखाए, जो
उन्होंने पिछले प्रेमी से रिश्ता टूटने के बाद वापस माँग लिए थे। यह तो वस्तुओं के
लेन देन का रिश्ता हुआ, व्यापार हुआ, प्रेम कहाँ हुआ? है न
दोस्तों! अगर प्रेम था, तो वो खत्म कैसे हो गया? कोई आपके बनाए साँचे में नहीं ढला, तो रिश्ता खत्म? प्रेम खत्म? कोई
आपके जैसा नहीं हो सका, तो तुम
कौन?
एक और उदाहरण देती हूँ, एक पुरुष मित्र हैं, जो अक्सर कहते हैं कि वे प्रेम तो कर लें, लेकिन उससे क्या ही लाभ? क्या
ही फ़ायदा? हम तो खुद से प्रेम करते हैं, खुद के लिए जीते हैं। मैंने पूछा फिर भी इतने
दुखी क्यों हो? जब खुद से प्रेम है, तो खुश रहो न भई, चेहरे पर मुस्कान क्यों नहीं? आँखों में से प्रेम झाँकता क्यों नहीं? हमेशा डरे डरे से क्यों रहते
हो? अशांत क्यों है मन, आनंद क्यों नहीं है जीवन में? और प्रेम
मदिरा की वह खुमारी कहाँ है? मित्र
चुप थे, कोई जबाव नहीं था उनके पास। जब खुद
ही रीते हो अंदर से, तो
दूसरे को क्या देंगे आप? फिर
लोग मंहगी वस्तुओं का लेन देन करके प्रेम
की कमी को पूरा करने लगते हैं, खुश
होते हैं और वस्तुओं में प्रेम खोजने लगते हैं और कहते हैं देखो, हम कितना प्रेम करते हैं एक दूजे से, कोई किसी को कार या बंगला गिफ्ट करता है, कोई किसी को हीरे मोती, लेकिन हीरा तो बना है, सदा के
लिए.. लेकिन प्रेम..प्रेम का कहीं अता पता नहीं...फिर सदा सदा के लिए वाली बात तो हवा में काफ़ूर हो गई|
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सच्ची बात तो यह है दोस्तों, कि लोग जानते ही नहीं कि खुद से प्रेम करने का
क्या मतलब है? खुद से प्रेम करना यानी खुद को समझ
लेना, खुद को जान लेना, खुद को बतला देना कि मुझे ये पसंद है, या मुझे इसकी चाह है और मैं इसे चाह कर खुश हूँ।
हम जब किसी को दुःख देते हैं न, तो
उससे ज़्यादा खुद दुखी होते हैं। इसके उलट हम जब किसी से प्रेम करते हैं न, तो उससे ज़्यादा खुद सुखी होते हैं। हम प्रेम अपने
लिए करते हैं, हमें कोई पसंद है, हमें कोई भाता है, हम किसी को सोचते हैं, याद
करते हैं और खुश हो लेते है। हमने प्रेम कर लिया, तो कर लिया, ये है
हमारा प्रेम संपूर्ण रूप से।
अब दूसरा करें या न करें, प्रतिदान दे या न दे, यह उसकी समस्या है, हमारी
नहीं। हमारे मन को ख़ुशी मिली, किसी
को चाह कर, याद करके, तो हम डूबेंगे आनंद में, दूसरा न डूबे, तो यह उसकी सोच है। प्रेम हमारे दिल में खिला, चंदन हमारे मन में महका, बेला हमारे हृदय में आधी रात को महकी, हम उसे महसूस करेंगे न, हम सुगंध से भर जाएँ, ना कि इस चिंता में कुंठित हो जाएँ कि वो अभी कहाँ होगा, किसके साथ होगा, मुझे याद करता है या नहीं, प्यार करता है या नहीं। इन बेकार के सवालों के जवाब नहीं मिलते कभी।
उलटे इनसे आपके रिश्ते खराब होते हैं, प्रेम को समझने से पहले खुद को समझना होगा कि आखिर हम चाहते क्या हैं?
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हाँ, प्रेम एक व्यक्ति करता है, दूसरा तो उसकी चमक से चमकता है बस। चंपा कहीं ओर खिलती है, लेकिन उसकी खुशबू से कहीं दूर, बहुत दूर कोई बौरा बौरा कर झूमने लगता है, प्रेम के अपने रहस्य हैं, यही तो शक्ति है प्रेम की, इसे ही तो समझना है बस। हम जब खुद को प्रेम से भर
लेते हैं, तो हम प्रेम पुंज हो जाते हैं, प्रेम के चुंबक हो जाते हैं। निःस्वार्थ भाव से जब साँसों की माला पे
किसी का नाम सिमरा जाता है तो, इस
हौले हौले चलने वाले मनकों की गति से
दूर..बहुत दूर कोई चिड़िया पंख फड़फड़ाने लगती है, यक़ीनन ये सब खुद से प्रेम के ही नतीजे हैं, हैं न दोस्तों!
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हमें अपने भीतर जो सबसे अच्छा गुण
लगता है, हमें उस गुण से प्रेम करें। यदि हमें
लोगों से प्रेम से बातें करना पसंद हैं, उनकी मदद करना या उनके दुःख दर्द
सुनना, तो गर्व कीजिए, अपने इस गुण पर, अपने किए पर कभी अफ़सोस मत कीजिए। हमारे पास जो था, हमने दे दिया, कोई नहीं लौटाए, तो ये
उसकी समस्या है, हमारी नहीं। हमें हमारा प्रेम कलश हमेशा भरते रहना चाहिए, जब भर जाए, तो उसे मुस्काते हुए छलकाते जाना चाहिए। आईने में खुद को देख मुस्काना
सीखना होगा दोस्तों, वैसे
बताइए, कभी मुस्काए हैं आप खुद को आईने में
देखकर?
दोस्तों, जब तक खुद के प्रति प्रेम से नहीं भरेंगे, तब तक दूसरों से कभी प्रेम नहीं कर सकेंगे।
भीतर.. बहुत भीतर से झरने फूटेंगे, तभी बाहर हरियाली होगी। शुरुआत बूँद जैसी छोटी ही क्यों न हो, लेकिन हो तो सही...। सच ही तो है भई, मेंहदी लगे हाथों से आप मेंहदी ही तो बाँटेंगे.. है न दोस्तों!
यहाँ एक और ज़िक्र भी ज़रूरी है..
अमेजन दुनिया की सबसे बड़ी नदी है, लेकिन
जहाँ से वह निकलती है, वहाँ
जल की एक एक बूँद टपकती है। दो बूँदों के
बीच लगभग बीस सेकंड का फ़ासला होता है, लेकिन एक एक बूँद गिर गिर कर अमेजन जैसी विशाल नदी बन जाती है, इतनी विशाल कि जब सागर में समाने के लिए सागर तट पर पहुँचती है, तो सागर भी हैरान हो जाता है, परेशान हो जाता है, उसे देख कर कि यह नदी है या मेरी तरह एक सागर?"
सच ही तो है दोस्तों, प्रेम भी तो ऐसे ही शुरू होता है बूँद बूँद से, और कैसे अथाह होता जाता है सागर सा... व्यक्ति व्यक्ति से और एक दिन व्यक्ति
"समस्त" से प्रेम करने लगता है। प्रेम अनंत है इसलिए एक व्यक्ति इसे
संभाल ही नहीं सकता, घबरा
जाता है, भय खाने लगता है, डूब जाता है और प्रेम उसे डुबो कर फिर आगे बढ़
जाता है। अब वो प्रेम नहीं, प्रार्थना
बन जाता है। प्रेम कभी किसी एक व्यक्ति पर नहीं टिकता, वो फैलता जाता है, मरता
नहीं हैं वह, बल्कि अपने रूप बदलता रहता है। जो
प्रेम कर रहा है, वो रहे न रहे, जिसे प्रेम किया जा रहा है, वो भी रहे न रहे, लेकिन प्रेम फिर भी रहता है हमेशा...एक शाश्वती की तरह, हर परिस्थिति में, हर हाल में, हमेशा।
यही तो कोशिश होनी चाहिए हमारी कि प्रेम बना रहे।
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दोस्तों! ऐसा ही होता है प्रेम! आप
प्रेमवश होकर कष्ट भी उठा लेते हैं, खुद
दुःख में भी डूब जाने के लिए तैयार हो जाते हैं, लेकिन प्रेम को होने देते हैं। प्रेम को खोजने आपको कहीं जाने की जरूरत नहीं होती, आपको खुद के भीतर ही तो झाँकना होता है बस..। हम
सभी के भीतर हमेशा प्रेम कलश भरा रहता है, उसे बस प्रेम से छूने भर की देर होती है, वो स्वतः ही छलकने लगता है। जब भी कोई प्रेम से
पुकारता है, मन को
छूता है हमारे, तो
प्रेम कलश भर भर जाता है। आप जितना उँड़ेलते हैं, वह मीठे पानी का सोता, अमृत सदृश
झरना, फिर
फिर भर आता है। पर.. पर, अक्सर हम उस कलश के ऊपर भय,शंकाओं पूर्वाग्रहों और संदेहों की साँकल चढ़ा देते हैं, ताले जड़ देते हैं, जैसे उन्मुक्त झरने के ऊपर भारी पत्थर रख दिया
हो... लेकिन भीतर, बहुत
भीतर फिर भी प्रेम बहता रहता है चुप चाप, मंथर गति से, बिना कोई आवाज़ किए..। उसे बहने दीजिए न.., ऊपर आने दीजिए न.., रोकिए मत..., टोकिए मत..., छलकने
दीजिए उसे, कुछ भी हो जाए, प्रेम हर हाल में जीवित रहना चाहिए। लेकिन पहली
शर्त है कि पहला प्रेम खुद से हो, खुद से हो प्रेम, खुद को
प्रेम से भर लीजिए फिर दूसरे से प्रेम कीजिए। व्यष्टि से समष्टि की ओर बढ़िए, फिर पूछिए खुद से, क्या कभी खुद से प्रेम किया है?
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बात जब खुद से प्रेम करने की हो, प्रेम कलश
की हो, स्नेह निर्झर की हो, मीठे पाने के सोते की हो, खुद के भीतर झाँकने की हो, मीठी नदियों से लेकर खारे समंदर तक की हो, अपने मन के दरवाजों खिड़कियों
को खोलने की हो, प्रेम नहीं, प्रार्थना की हो, खुशबू को महसूस करने की हो, तो बातें हैं बहुत सारी, तो
यूँही ख़त्म कैसे हो जाएँगी? अपने
कुछ किस्से कहानियाँ हमें भी सुनाइए..
सुनाइएगा ज़रूर..। मैसेज बॉक्स में भेजिएगा ज़रूर, मुझे इंतज़ार रहेगा.....और आप भी तो इंतजार करेंगे न ....अगले एपिसोड
का...करेंगे न दोस्तों!
सुनते रहिए, हो सकता है, ये बातें करते करते आप खुद से
प्रेम करने के सच्चे मायने जान जाएँ, और खुद
से प्रेम करने लगें, है न
दोस्तों? इसीलिए मेरे चैनल को सब्सक्राइब
कीजिए...मुझे सुनिए....औरों को सुनाइए....मिलती हूँ आपसे अगले एपिसोड के साथ...
नमस्कार दोस्तों!....वही प्रीत...वही
किस्से कहानियाँ लिए.....आपकी मीत.... मैं, मीता गुप्ता...
END MUSIC
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