EPISODE-1 ऐ री मैं तो प्रेम दीवानी 16/01/26

EPISODE-1 

ऐ री मैं तो प्रेम दीवानी 16/01/26

INTRO MUSIC

नमस्कार दोस्तों! मैं मीता गुप्ताएक आवाज़एक दोस्तएक किस्से कहानियाँ सुनाने वाली आपकी मीत  लीजिए हाज़िर हैंनए जज़्बातनए किस्सेऔर कुछ पुरानी यादेंउसी मखमली आवाज़ के साथ...आज हम बात करने जा रहे हैं प्रेम की..जी हाँ! ऐसा प्रेम जो अलौकिक हैदैविक हैअमर हैअजर है और शाश्वत है। जब भी हम प्रेम की बात करते हैं नतो एक ओर हमें श्रीकृष्ण की याद आती हैतो दूसरी ओर कृष्ण के साथ-साथ राधा का नाम बरबस ही याद आ जाता हैलेकिन आज मैं राधा की नहींमीरा की बात करूँगी। जी हाँप्रेम दीवानी मीराजिसका दरद कोई नहीं समझ सकाऐसी मीरा को हम सभी जानते हैंपरिचित हैंहम सभी ने वह कहानी सुन भी रखी होगीऐसी कहानीजो हम सब को प्रिय है। आज प्रसंगवश इस कहानी से बात शुरू करती हूँ। चित्तौड़राजस्थान की मीरा जब छोटी थींतो उनके घर एक साधु आएजो कृष्ण भक्त थे। साधु अपने साथ श्रीकृष्ण की मूर्ति भी लेकर आएजिसे वे बरसों से पूज रहे थे। बालिका मीरा उस मूर्ति को देखकर मचल उठी और साधु से मूर्ति की माँग कर बैठी। साधु ने साफ़  मना कर दिया कि वे बरसों से इस मूर्ति को पूज रहे हैं। कहने लगेयह कोई साधारण मूर्ति नहींइसमें साक्षात श्री कृष्ण विराजते हैं। यह कोई खेलने की वस्तु नहींजो मैं तुम्हें दे दूँ। मीरा रोती रही और साधु चले गए।

MUSIC

दोस्तों! संभवतः रोदन के साथ मीरा का रिश्ता यहीं से बन गया था। किवदंती के अनुसार रात को साधु के सपने में श्रीकृष्ण आए और कहने लगे, तुम मेरी मूर्ति मीरा को दे दो। साधु ने कहाहे कान्हा! मैंने जन्म भर आपकी पूजा की हैपरंतु आपने दर्शन नहीं दिए और आज आप आए हैंतो उस नादान लड़की को मूर्ति देने के लिए कह रहे हैंक्या लीला है प्रभुश्री कृष्ण ने कहाहे साधु! मेरी मूर्ति बस उसी की होगीजो मेरे के लिए दिन रात रोती है।

चलिएअब मैं अपनी बात को इसी छोर से शुरू करती हूँ। क्या सचमुच हे कृष्णतुम आए थे साधु के सपने में या यह भी तुम्हारा कोई छल थाबोलो न छलिया? 

आज तुमसे कुछ प्रश्न पूछना चाहती हूँ कान्हाजब से इस धरती से गए हो , क्या एक बार भी इस धरती की सुध ली है तुमनेक्या तुम्हें इस धरती की याद भी आती हैक्या यह याद कभी सताती भी हैतुम तो वचन देकर गए थे कि मैं लौटूँगाफिर भी लौट कर नहीं आएतुमने अपनी मोहक मुस्कान से सबको खूब छला। गोपियों को अपनी बंसी की मधुर लहरी सुनाकर बेसुध कर दिया। राधा को अपने प्रेम का दीवाना बना दिया। राधा के प्रेम में तो तुम भी बावरे हो गए थे नाबोलो ना कान्हा?

तुमने राधा संगगोपियों संगखूब होली खेली तुम्हारे और राधा के प्रेम गीत आज भी ब्रज की गलियों में गूंजते हैं। मधुबन में महारास में तुमने हर गोपी के साथ तुमने रास रचाया। हर गोपी यही समझती रही कि तुम सिर्फ़ उसके साथ होलेकिन कृष्ण तुम वहाँ थे ही नहींतुम सिर्फ़ राधा के पास थेराधा के प्रेम में आसक्त हो कर तुमने जो छल किया नकभी चूड़ी वाले बनेकभी स्त्री स्वांग रचायाऔर न जाने क्या-क्याहे कान्हा!

MUSIC

एक बात बताओ ना कान्हाब्रज की गलियों में राधा संगमहलों में रुक्मणी संगसत्यभामा संग अनगिनत रानियोंपटरानियों के बीच क्या कभी तुम्हें उस विरहिणी की याद आती थीजो तुम्हारे नाम की वीणा लिए रेगिस्तान की तपती धूप में खुद को जलाती रहीजिसने सिर्फ़ तुम्हारे कारण अपने महलों की सुख सुविधाएँ त्याग दींऔर तपती रेत पर अपने आँसुओं के प्रेम की इबारत लिख दीप्रेम को इबादत मान बैठीउसके दिन तुम्हारे वियोग में झुलस गए और उसकी रातें तुम्हारी याद में बंजर हो गईंउसके जीवन में कभी मिलन के फूल नहीं खिला पाए तुम कृष्ण?

हे गिरिधर! आज सच्ची-सच्ची बताओअब बता भी दो न....कि मीरा तुम्हें इतना प्रेम क्यों करती थीक्या चाहती थी वो तुमसेतुम तो त्रिकालदर्शी हो नक्या बता सकोगे कि मीरा ने ऐसा क्यों कहा, 'आवन कह गएअजहूँ ना आए।’ क्या तुमने मीरा से कोई वादा किया थाबोलो न गिरिधर! क्या दुनिया से छिपाकरहे छलिया! तुमने अपनी मोहक मुस्कान से उसे भी दीवानी बनाया थाबोलो ना कान्हा! मीरा तो राधा की तरह तुमसे प्रेम की माँग भी नहीं करती थीना रासना मिलन की आसना कोई योगना ही कोई भोगफिर वह क्या चाहती थीऔर क्योंक्या तुमने कभी यह जानावह मंदिरों मेंसंतों के डेरों परजा-जाकर तुम्हारा पता पूछती थी कान्हावह बादलों की तरह मीलों चलती थीहे कृष्ण! क्या तुम मीरा के लिए दो कदम भी साथ चले थेअच्छाएक बात बताओ मोहन! क्या कभी रेत के संग पानी मिल कर चला हैक्या कभी रात के सन्नाटों में जब सारी दुनिया सो रही होतीक्या उस वीराने में तुम्हें मीरा की सिसकियाँ सुनाई देती थींमीरा के मन में तुम्हारे प्रेम की जो लौ जल रही थी कान्हाक्या कभी उसकी ऊष्मा को तुमने महसूस कियाक्या मीरा के प्रेम की अगन से तुम कभी विचलित हुएहे कृष्ण! बताओ ना..क्या तुमने जानबूझकर उसे वियोग के दावानल में छोड़ दिया थाकहीं ऐसा तो नहीं....कान्हा! कि तुम उसके तप से घबराते थेउसकी सच्चीनिष्पापनिष्कलंकित भक्ति से घबराते थेसुनो ना.. मोहन! तुम कभी भी उसके पास नहीं गए। अपने नियमों में बंधे तुम कभी नियम तोड़ न सकेफिर चाहे मीरा सभी नियमोंपरंपराओं को त्याग कर कभी बावरी और कभी कुलनाशिनी कहलाती रही। सारे नियमसारे दर्शनसारे आदर्शसारे सिद्धांतमीरा के ही हिस्से में क्यों आएवंशीधर! उत्तर दो ना..सारे सही-गलत के गणित केवल मीरा के लिए ही क्यों थे?

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किसका प्रेम बड़ा हैबोलो न कान्हा! राधा का या मीरा काबोलो! आज तो तुम्हें बताना ही होगाकिसका पलड़ा भारी थातुमने आने का वचन दिया था नफिर भी नहीं लौटेअब जब कभी भी तुम आओगे न कृष्णमीरा की रूहउसकी आत्मा आज भी तुम्हें विरहिणी बनकर भटकती मिलेगी और गाती मिलेगी- मेरे तो गिरधर गोपालदूसरों न कोई।

तो क्या मीरा का प्रेम निरर्थक रह गयाजी नहींमीरा का प्रेम व्यष्टि से समष्टि बन गया और मीरा का प्रेमहर एक प्रेम करने वाले के दिल में समा गया और उसका दरद रेगिस्तान की रेत के कण-कण में व्याप्त हो गया। मीरा के आँसुओं ने सागर की हर बूँद में समा कर उसे खारा बना दिया। मेरे मन में अक्सर यह प्रश्न भी कौंधता है कि कैसे समेट लिया सागर ने इतने विस्तृत विरह को?

कभी यदि कान्हातुम हमें भटकते हुए गलियों में मिल गए नतो मैं पूछूँगी ज़रूरचलोबोलोआज तो सच बोल ही दोआज मैं तुम्हारी मोहक मुस्कान में उलझ कर हमेशा की तरह अपने प्रश्न नहीं भूलूँगी। देखो कान्हामैंने आँखें बंद कर ली हैंअब बताओहे कान्हा! मीरा तुमसे इतना प्रेम क्यों करती थीआज भी उसकी रूह भटकती रहती है...तुम्हें तलाशती हुईतुम्हें खोजती हुई

MUSIC

मेरे ये सवाल ऐसे खत्म नहीं होंगे कान्हामीरा की तरह हम सभी को इंतज़ार रहेगा जवाबों कासही है न वंशीधर?

क्यों दोस्तों! आप ही बताइएआप भी तो कान्हा से जवाब माँगते हैं न....मैसेज बॉक्स मे लिखकर बताइए, अपनी बातों को मुझे बताइए..|

सुनिएगा ज़रूर… हो सकता हैमीरा की अमर कहानी आपकी ही कहानी हो! आपके विरह की कहानी होआपके प्रेम की कहानी हो।

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नमस्कार दोस्तों....वही प्रीत...वही किस्से-कहानियाँ लिए.....आपकी मीत.... मैंमीता गुप्ता...

END MUSIC

 

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