EPISODE-2 कोई लौटा दे मेरे बीते हुए दिन.. 30/01/26

EPISODE  2

कोई लौटा दे मेरे बीते हुए दिन....30/01/26

INTRO MUSIC

नमस्कार दोस्तों! मैं मीता गुप्ताएक आवाज़एक दोस्तएक किस्से कहानियाँ सुनाने वालीआपकी मीत। लीजिए हाज़िर हैंनए जज़्बातनए किस्सेऔर कुछ पुरानी यादेंउसी मखमली आवाज़ के साथ...आज हम बात करने जा रहे हैं बचपन की.... आप सोच रहे होंगे....उम्र पचपन कीऔर बातें बचपन की....सच कहूँ दोस्तों! यही तो वह समय है जब बचपन की वीथियों में फिर से विचरण करके जीवन पीयूष का रसपान किया जा सकता है......बात यह हुई कि पिछले दिनों मैं लंदन गई थीपिक्काडली सरकस की रंगीन सडकों पर घूमते हुए ऐसा लगा कि....सहसा ठंडी हवा का कोई झोंका आया। झोंका थाखुशबू थी, या खुशी का ज्वार था...हुआ यह.... कि अचानक अलका जो दिख गई। अलकामेरे बचपन की सबसे प्रिय दोस्त.... फिर क्या था....शुरु हो गया बातों का सिलसिलायह हिसाब लगाने में घंटों लगे कि कितने सालों बाद मिल रहे हैंतू कितनी मोटी पतली हो गईबच्चेपतिऔर फिर शुरू हुई लंदन की कड़कड़ातीजमा देने वाली सर्दी में आइसक्रीम डेट.....जी हाँ दोस्तोंआइसक्रीम डेटफोटो शेयर करते हुए उसने कैप्शन में लिखा , 'लाइफ के हर फेज़  में हर किसी के दोस्त होते हैंलेकिन बचपन के कुछ दोस्त जीवन के सभी फेज़ में आइसक्रीम शेयर करने के लिए साथ रहते हैं। उसने आगे जो लिखावह तो और भी मज़ेदार था, 'एक साल के लिए आइसक्रीम का कोटा पूरा हो गया.. जब तक हम दोबारा नहीं मिलते।ऐसी होती है बचपन की दोस्ती....ऐसी ही अनेक इंद्रधनुषी यादों की संदूकची को आज हम खोलेंगे.....हम बीते दिनों की यादों में खो जाएँगे.....कभी डूबेंगे...कभी उबरेंगे....कभी अडूब डूबे रहेंगे....।

MUSIC

तो दोस्तों! चलिए आज बात करते हैंबीते हुए दिनों की....ऐसे दिन जब न दौलतन शोहरत की चिंता थीमुझे बस याद है झुर्रियों से भरे चेहरे वाली वह नानीजो परियों की कहानियाँ सुनाया करतीरेत में घरोंदे बनानाबना बना कर मिटानाअपने खिलौनों को अपनी जागीर समझनाअपनी टूटी फूटी गुड़िया को भी सबसे सुंदर माननान दुनिया का ग़म थान रिश्तों के बंधनबस बचपन का वह सावन थावो कागज़ की कश्ती और वो बारिश का पानी था। कभी लहरों के करीब जाकर उन्हें छूने की बेताबीकभी उनके पास आने पर चिल्लाकर दूर भाग जानाकभी घोष दादा की बंहगी से ‘रोशोगुल्ला’ निकालकर खाने ज़िद करनाकभी खोमचेवाले से गुब्बारेकभी फेरीवाले से बुलबुले खरीदने थेफिर बुलबुलों और गुब्बारों के साथ पूरे घर में धमाचौकड़ी मचानामाँ  की डांट से बचने के लिए साईकिल ले गलियों में घुमानाऔर गिर पड़े,और गिर पड़े तो रोकर उसी के आँचल में छुप जानादोस्त से लड़कर मुँह फुलाकर बैठ जानापर अगले ही दिन उसी के साथ खेलनाबड़े बड़े आँसू टपका कर कुल्फी के लिए शोर मचानाऔर फिर एक मासूम सी मुस्कान के साथ छुपकर मज़े से उसे खानादेर रात तक डैडी के साथ पिक्चरों के आनंद उठानाऔर जब नींद आ जाएतो उन्हीं की गोद में सिर रखकरसपनों की दुनिया में कहीं गुम हो जानाएक बुरा सपना देखकरपलंग के नीचे छुप जानाकोई जब फुसलाने आएतो उसी के आगोश में खो जानाहर घड़ीहर पलआज़ाद पंछी की तरहज़िंदगी को जीते जाना और ठोकर लग जाएतो ज़ख्म पोंछकर आगे बढ़ जाना।

हर किसी को अपना बचपन याद आता है,आता है न। हम सबने अपने बचपन को जीया है। शायद ही कोई होगाजिसे अपना बचपन याद न आता हो। बचपन की मधुर यादों में माता पिताभाई बहिनयार दोस्तस्कूल के दिनआम के पेड़ पर चढ़कर 'चोरी सेआम खानाखेत से गन्ने उखाड़कर चूसना और ‍खेत के मालिक के आने पर 'नौ दो ग्यारहहो जानाहर किसी को याद है। जिसने 'चोरी सेआम नहीं खाए और गन्ना नहीं चूसाउसने अपने बचपन को क्या खाक जियाचोरी और ‍चिरौरी तथा पकड़े जाने पर साफ़ झूठ बोलनाफ़र्श पर बिस्कुट की रेल बनानाबचपन की यादों में शुमार है। बचपन से पचपन तक यादों का अनोखा संसार है। सच में

रोने की वजह भी ना थीना हँसने का बहाना था

क्यों हो गए हम इतने बड़ेइससे अच्छा तो बचपन का ज़माना था 

(साभार मशहूर उर्दू शायर जौन एलिया) 

music 

दोस्तों! छुटपन में धूल गारे में खेलनामिट्टी मुंह पर लगानामिट्टी खाना किसे नहीं याद हैऔर किसे यह याद नहीं है कि इसके बाद माँ  की प्यार भरी डांट फटकार व रुंआसे होने पर माँ  का प्यार भरा स्पर्श! इन शैतानीभरी बातों से लबरेज़ है सारा बचपन।

सच कहूँ तो दोस्तों! जो न ट ख ट नहीं थाउसने बचपन क्या जियाजिस किसी ने भी अपने बचपन में शरारत नहीं कीउसने भी अपने बचपन को क्या खाक जियाक्योंकि बचपन का दूसरा नामही ‘न ट ख ट पन’ है। शोर व ऊधम मचातेचिल्लाते बच्चे सबको लुभाते हैं और हम सभी को भी अपने बचपन की सहसा याद हो दिला जाती हैं।फिल्म 'दूर की आवाज़में जानी वॉकर पर फिल्माए गए गीत की पंक्तियाँ कुछ यूँ ही बयान करती हैं  

हम भी अगर बच्चे होते,

नाम हमारा होता गबलू बबलू,

इस गीत में नायक की भी यही चाहत है कि काश! हम भी अगर बच्चे होतेतो बचपन को बेफ़िक्री से जीते और मनपसंद चीज़ें खाने को मिलतीं। हम में से अधिकतर का बचपन गिल्ली डंडा,पोशमंपा,खो खोधप्पा,पकड़न पकड़ाईछुपन छुपाई खेलते तथा पतंग उड़ाते बीता है। इन खेलों में जो मानसिक व शारीरिक आनंद आता हैवह कंप्यूटरजनित खेलों में कहाँ?

वह रेलगाड़ी को 'लेलगालीव गाड़ी को 'दालीया 'दाड़ीकहना......हमारी तोतली व भोली भाषा ने सबको लुभाया है। वह नानी दादी का हमारे साथ साथ हमारी तोतली बोली को हँसकर दोहराना....शायद बड़ों को भी इसमें मज़ा आता था और हमारी तोतली बोली सुनकर उनका मन भी चहक उठता था।

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जी हाँ दोस्तों! अपने बचपन में डैडी द्वारा साइकिल पर घुमाया जाना कभी नहीं भूल सकते। जैसे ही डैडी ऑफ़िस के लिए निकलते थेवैसे ही हम भी डैडी के साथ जाने के लिए मचल उठते थेचड्डू खाने के लिएतब डैडी भी लाड़ में आकर हमें साइकिल पर घुमा ही देते थे। बाइक व कार के ज़माने में वो 'साइकिल वालीयादों का झरोखा अब कहाँ?

दोस्तों! बचपन में हम पट्टी पर लिख लिखकर याद करते और मिटाते थे। न जाने कितनी बार मिटा मिटा कर सुधारा होगा। पर स्लेट की सहजता व सरलता ने पढ़ना लिखना सिखा दियावाह! क्या आनंद था ?

जब बच्चे थेतब बड़े होने बड़ी जल्दी थीपर बड़े होकर क्या पाया? हर समय दिन भर कितने ही चेहरे देखती हूँ सड़कों परकार्यस्थल परहर जगह बहुत से चेहरेपर इनमें से कोई भी चेहरा ना हँसता दिखाई देता हैना ही खुशनुमा। अक्सर लोग हैरान परेशान से दिखते हैंखुश होते भी हैंतो ज़रा देर के लिएमानो हँसने या खुश होने में भी उनके पैसे खर्च हो रहे हों। आज लगता है कि बच्चों का 'बचपनभोलापनमासूमियतनिश्छलता, 'पचपनके चक्कर में कहीं खो सी गई है!

इंसान का बचपन उसकी प्रेरणा होता है। बचपन में की गई गलतियाँनादानियाँ व शैतानियाँ बड़े होकर जब याद आती है न दोस्तों! तो हमें हँसी आ जाती हैहै न दोस्तों! उसकी सुखद मधुर यादें हमारे दिल ओ ज़हन में मृत्युपर्यंत बनी रहेंगी। नहीं जाने वाली हैं।है न दोस्तों!

MUSIC

दोस्तों! अब उलझनें बहुत बढ़ गई हैं ज़िंदगी मेंउन्हें कोई जिगसॉ पज़ल की तरह मिनटों में कैसे सुलझाएँचलो चलें! खिलौनों और चॉकलेट्स की उसी दुनिया में वापस चलें। ऐसे जहाँ की ओर चलेंजहाँ न हो किसी से ईर्ष्या होकिसी से जलनजहाँ छोटी छोटी चीज़ों में ही हमारे सब सपने सच हो जाएँ। कागज़ के पंखों पर सपने सजाकरगेंदे के पत्तों से कोई धुन बजाकरख़ाली थैलियों की पतंगें उड़ाएँरातों को टॉर्च से आसमाँ चमकाएँमम्मी से बेमतलब लाड़ जताकरडैडी से रेत के घर बनवाकरभैया की साइकिल के पैडल घुमाकर दीदी की गुड़िया को भूत बनाकरभरी दुपहरी में हर घर की घंटी बजाकर भाग जाएँबागों में छुप छुपकर आम चुराएँ और मधुर मिष्टी यादों को फिर से सहलाएँ। है न दोस्तों!

music 

बातें बचपन की हैंयूँ ही ख़त्म करने का मन नहीं करतापर.....क्या करें.....समय की बाध्यता है! मेरी इन सब शैतानियों में आपकी वाली शैतानी कौन सी थीअपने बचपन के किस्से कहानियाँ मुझे मैसेज बॉक्स में लिखकर भेजिएगा ज़रूरमुझे इंतज़ार रहेगा.....और आप भी तो इंतजार करेंगे न ....अगले एपिसोड का...करेंगे न दोस्तों!

सुनिएगा ज़रूर… हो सकता है,मेरे बचपन की कहानी में आपके भी किस्से छिपे हों...! मेरे चैनल को सब्सक्राइब कीजिए...मुझे सुनिए....औरों को सुनाइए....मिलती हूँ आपसे अगले एपिसोड के साथ...

नमस्कार दोस्तों!....वही प्रीत...वही किस्से कहानियाँ लिए....आपकी मीत....मैंमीता गुप्ता...

END MUSIC

 

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